Subscribe Us

बीमार आवाज (कविता) -नैना सुब्बा बराईली


असफल हम
खुद का विश्लेषण करने में
जीवन के बदली से
खुद को झाँक कर देखने में,
भूल जाते हैं खुद को

आईने में देखना
ये किस पहचान के खोज में है हम
किस अस्मिता के खोज में है हम
कैसे रंग की उमंग में है हम
एक वैसाखी के भरोसे
कैसे वसन्त के इन्तजार में है हम

कैसा कारवाँ, कैसा गन्तव्य है ये
शराब से पिघलता हुआ हाथों से
पूर्वजों के खेत खलियान खोद कर
दीमक से ढका हुआ
पुराना हथियार निकाल के
हम अपने ही भाई को ललकारते है
कीचड़ में फिसलते-फिसलते
हम युद्ध घोषणा करते हैं
इसीलिए खुद का घोषित युद्ध
पुछता है प्रश्न हमसे बार-बार
मगर हम निःशब्द है
निःशब्द है।

हाँ, आप और मैं मिलकर
'हम' नहीं बन सके
जैसा हम एक टूटा हुआ दर्पण हैं
एक ऐसी नदी हैं
जो अपनी बहाव मे ही सूख जाती है,
क्या पार करोगे नद
किनारे पर ही हम फंसे हैं,
यात्रा भी क्या कहें इसे
जिसकी मुंह मंजिल की ओर नहीं है

संघर्ष भी क्या कहें इसे
जिसकी कदम सही जगह पर नही है।
इसलिए मित्र,
क्या उपयोग ये मौन जुलूस का
कौन सुनेगा ये बीमार आवाज
जो किसी के कानों तक नहीं पहुंच पाती है
जो किसी का ध्यान तक नहीं पहुंच पाती है।

-श्रीमती नैना सुब्बा बराईली, दिल्ली

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ