Subscribe Us

हाइकु -सूर्यप्रसाद लाकोजू


अक्षर खेती
कुआं का हूं मेंंडक 
छोटी सा मुँह ।

युद्ध की भूमि
बचा वह किरण
खिलेगा फूल ।

बोलता कौवा
स्वयं को मजदूर 
ठगी का धंंधा।

आज का फूल
प्रेम के बाजार में
लज्जा बेचता ।

मेरा पुरखे
दासता के कुँए में
डूबते रोज ।

चमकता है
लोभ के आकाश में
पैसा के चांद।

रात की रानी
दिन की है जवानी
चेहरे है दो।


-सूर्यप्रसाद लाकोजू, नेपाल

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ