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दिन जाड़े के आए (नवगीत) -अशोक आनन


पहनकर
गर्म ऊनी कपड़े -
दिन जाड़े के आए ।

बैठ धूप में ये -
बदन अपना सेंके ।
गप्प हांक - हांक -
ये दूर की फैंके ।

ले - लेकर
चाय की चुस्कियां -
दिन जाड़े के आए ।

कुट्टी कर सूरज से -
ये थर - थर कांपें ।
लपेटकर कम्बल -
ये सारी रात तापें ।

हवाओं के
खा - खाके थप्पड़ -
दिन जाड़े के आए ।

नहाने के नाम पर -
इन्हें नानी याद आए ।
कोई न कोई रोज़ -
ये नया बहाना बनाएं ।

सर्द मौसम को
रोज़ कोसते -
दिन जाड़े के आए ।

कोहरे ने इन्हें सुबह से -
आ , धर दबोचा ।
हवाओं ने इन्हें पकड़ -
तबीयत से दोंचा ।

कुटते - पिटते
रोते - विलखते -
दिन जाड़े के आए ।

-अशोक आनन ,मक्सी

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