म.प्र. साहित्य अकादमी भोपाल द्वारा नारदमुनि पुरस्कार से अलंकृत

ज़ुल्म अब सहना नहीं


कष्ट में रहना नहीं।
ज़ुल्म अब सहना नहीं।

बात कोई बे सबब,
भूल कर कहना नहीं।

बद हवासी में कभी,
कुछ कहीं गहना नहीं।

एक धोका खा चुके,
टूट कर चहना नहीं।

आन के बदले कभी,
ताज भी पहना नहीं।

भूल कर शर्मो हया,
रौ में यूँ बहना नहीं।

दायरा मत छोड़ना,
दूर जा रहना नहीं।

-हमीद कानपुरी, कानपुर

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ