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नारी जीवन संघर्ष मय

मनीषा प्रधान 'मन'

हॉ ये सच है
नारी जीवन संघर्ष मय है
पग-पग में बेड़ियां,
पग-पग में रिश्तों का बंधन है
हॉ ये सच है
नारी जीवन संघर्ष मय है

मातृ शक्ति होते हुए भी
अपने ही बच्चों के
आगे झुक जाती है ,
अन्नपूर्णा होते हुए भी
अक्सर रातों को भूखी सो जाती है
जिव्हा पर अधिकार रखते हुए भी
वक़्त बे वक़्त वो चुप रह जाती है

सफलता के शिखर छूकर भी
वो जाने कितनी ही बार
गिरा दी जाती है
इच्छाओं का दमन कर
मर- मर कर भी जीती है
पुरुषत्व का साम्राज्य में है ही
नारी पर भारी
और अक्सर नारी ही नारी की
दुश्मन बन जाती है

एक नारी सत्यवती बन
यमराज से लड़ आयी
एक अनसुइया बन
देवों की माँ कहलायी
एक सीता बन
अग्नि परीक्षा भी दे आयी
तो कभी मातृ रूप में
आँचल जला आयी

देवों में शक्ति रूपी बन पूजी गयी
किन्तु धरती पर,
अबला नारी ही कहलायी
कितना विषम है, नारी जीवन
न शून्य, न इकाई, न दहाई
फिर भी प्रेम की प्रतिकृति
जिसके कारण धरा पर
जीवन अभय है।
हॉ ये सच है
नारी जीवन संघर्ष मय है

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