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नायक और महानायक चुप

गौरीशंकर वैश्य विनम्र

नायक और महानायक चुप।
बड़े-बड़े हैं खलनायक चुप।

हा हा, ही ही करने वाले,
नर्तक, वादक. गायक चुप।

पंडित - मुल्ला दम साधे हैं,
लायक चुप, नालायक चुप ।

साँप सभी को सूँघ गया है,
सांसद और विधायक चुप।

सभी दैत्य मिल एक हो गए,
नकली सिद्ध विनायक चुप।

काठ के उल्लू हैं सेनानी,
चूहे सेनानायक चुप।

मंचों पर चिल्लाने वाले,
महाबली अधिनायक चुप।

न्यायालय की उड़ी धज्जियाँ,
सारे नीति नियामक चुप।

चूड़ी - कंगन खनक रहे हैं,
देश - धर्म उन्नायक चुप।।

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