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तालाब संस्कृति

डॉ निरूपमा वर्मा
गांव की मुख्य सड़क पर ही बस से नरेंद्र उतर कर किनारे खड़े हो गया। गांव के भीतर जाने के लिए सड़क पर कोई सवारी नहीं मिलती है । या पैदल जाना होता या कोई मोटर साइकिल या ट्रैक्टर आदि मिल जाये तो ही पहुंचा जा सकता है । 
उसे लेने उसका बचपन का सहपाठी विपिन अपनी बाइक ले कर आया था । 
गांव की कच्ची, ऊबड़-खाबड़ सड़क पर उछलती बाइक पर ख़ुद को संभालते हुए दोनों की बातें जारी थी। नरेंद्र ने पूछ ही लिया --" आज गांव में विशेष कार्यक्रम क्या है ? जिसके लिए पिता जी ने मुझे शहर से बुलाया ? 
'तू खुद देख ले ' --विपिन ने कहा । 
गांव में आज सच में बड़ा जश्न मनाया जा रहा है । पूरा गांव मिलकर मानो कोई त्योहार मना रहा हो । किसी के हाथों में पूजा की थाली है , कोई दीये ले कर खड़ी है । लड़के - बच्चे मिठाई बांटते ,खाते झूम रहे …! - " 
नरेंद्र की उत्सुकता और बढ़ गई । उसके पूछने पर विपिन उसे बताने लगा ..
पिछले कई महीनों से सुखीलाल , मई की तपती धूप में फावड़ा लेकर अपने खेतों में जगह जगह खुदाई करता , - मिट्टी निकालता , उसे गीला कर गोला बनाता और हवा में उछाल देता ...गोला टूट जाता तो वह निराश हो जाता और आगे बढ़कर फिर खुदाई करता , फिर मिट्टी निकालता , पानी से गीला कर मिट्टी का गोला बना कर हवा में उछालता ….लोग देखते और हंसते --” बेटे के गम में सनक गया !बुढ़ऊ !! लेकिन एक दिन सुखीलाल का गोला हवा में नहीं टूटा ..वह खुशी से चिल्लाने लगा ..” मिल गई ..मिल गई ..यही है , उपयुक्त जगह !!..बस उस ने खुदाई करना शुरु कर दिया। “ अब गाँव वालों को भी समझ आ गया , कि सुखीलाल ने पारम्परिक तरीके से मृदा परीक्षण किया है । सो उसके साथ लोग जुड़ते चले गए और सब ने मिल कर बरसात आने से पहले ही सारा काम समाप्त कर दिया । अब कुछ -कुछ नरेंद्र को भी सारी बात समझ में आने लगी ।
बाइक से उतर कर अपना बैग कंधे पर लटकाते हुए नरेंद्र ने देखा। वर्षा के पानी ने नव निर्मित तालाब को पूरा भर दिया था । तालाब ने नई जिंदगी दी है गांव वालों को । खुशहाली लौट आई जैसे । सूखे की मार ने उसके गांव की खुशियां छीन ली थीं । तभी तो वह गांव छोड़ कर शहर चला गया था । विपिन ने नरेंद्र से कहा -" तुझे दादी की बात याद हैं न । कैसे खुश हो कर तालाब के किस्से सुनाती थीं ...." तालाब के आसपास ही सभी महत्वपूर्ण काम हुआ करते थे शादी-ब्याह, मेला, यज्ञ और सुबह-शाम की बैठकी भी तो वहीं हुआ करती थी। तालाब के किनारे हमेशा लोगों और गाय-भैंसों का जमावड़ा बना ही रहता । " 
हां ..नरेंद्र ने बिना कुछ कहे सिर हिला दिया । और नव निर्मित तालाब के पास पहुच कर सुखीलाल के पैर छू लिए --'पिता जी अब मैं भी लौट आया हूँ आपके पास ! अपने गांव !! ,हमेशा के लिए!!!
सुखीलाल के चेहरे पर खुशहाली छा गई । सामने के टूटे हुए दो दांतों के साथ हंस पड़े , उसके सिर पर आशीष भरा हाथ रखते हुए बोले ---"हाँ रे ! यही तो है तालाब संस्कृति । "

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