म.प्र. साहित्य अकादमी भोपाल द्वारा नारदमुनि पुरस्कार से अलंकृत

नापाक दर्द

राजीव डोगरा 'विमल'
अपनी आत्मा को झिझजोड़ के देखना
वो भी अश्क बहाने लगेगी
मुझे सोच कर।
अगर फिर भी
तुमको सुनाई न दे तो
समझ लेना तुम बहरे हो
कानों से नहीं अपनी सोच से भी।

मेरे बहते हुए अश्कों में
महसूस करना,
मेरी अंतरात्मा के दर्द को।
अगर महसूस न हो
तो समझ लेना
तुम पत्थर हो दिल से ही नही
अपने जमीर से भी।

कभी तलाश करना
तनहाई में मेरे दर्द को
मेरी चीखती आहों को,
अगर दिखाई न दे
तो समझ लेना
तुम अंधे हो आंखों से भी
और जज्बातों से भी।

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