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प्राचीन भारत की दार्शनिक मान्यताओं का दस्तावेज़ है सूत्रकृतांग : डॉ. धींग

डॉ. धींग
चेन्नई। प्राकृत ग्रंथ सूत्रकृतांग सूत्र प्राचीन भारत की दार्शनिक मान्यताओं का ऐतिहासिक दस्तावेज है। इसमें आज से ढाई-तीन हजार वर्ष पूर्व की जीव और जगत के बारे में विभिन्न मान्यताओं का रोचक व समीक्षात्मक विवरण दिया गया है।यह बात 5 जनवरी को मद्रास विश्वविद्यालय के जैनविद्या विभाग की वार्षिक व्याख्यानमाला में बतौर मुख्यवक्ता डॉ. दिलीप धींग ने कही। डॉ धींग ने कहा कि शास्त्रार्थ के युग में भी सूत्रकृतांग में अन्य परंपरा के ऋषियों के लिए बहुत सम्मान दर्शाया गया है। सूत्रकृतांग में कहा गया है कि ज्ञानी या शिक्षित होने का सार यह है कि किसी प्राणी की हिंसा न की जाए। समस्त विचारधाराओं के बीच अहिंसा का सिद्धांत सर्वोत्तम है। 
दो चरणों में दिये व्याख्यान में डॉ. धींग ने सूत्रकृतांग में के छठे अध्ययन ‘वीरस्तुति के आधार पर ज्ञातपुत्र भगवान महावीर के 54 विशेषण बताए और उनकी व्याख्या की। उन्होंने कहा कि उस जमाने में भी अनेक लोग शरीर और आत्मा को एक ही मानते थे, पुण्य-पाप और स्वर्ग-नरक का निषेध करते थे। सूत्रकृतांग में अनेक तर्कों द्वारा ऐसी मान्यताओं का निराकरण किया गया है। इसमें किसी मत का विरोध करने की बजाय हिंसा और असंयम का विरोध किया गया है। सूत्रकृतांग में कहा गया है कि जो सिर्फ अपने मत की प्रशंसा और दूसरे मतों की निंदा करता है, वह संसार में परिभ्रमण करता है। विभागाध्यक्ष डॉ. प्रियदर्शना जैन ने डॉ. धींग का परिचय देते हुए उनके साहित्यिक योगदान को रेखांकित किया। जैनविद्या शोध प्रतिष्ठान के महासचिव कृष्णचंद चोरड़िया ने कहा कि डॉ. धींग ने एक अछूते विषय पर खूब मेहनत करके व्याख्यान दिया। छात्रा ज्योति ने मंगलाचरण किया। कार्यक्रम में विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान की माता शोभा रेशमा भंसाली सहित अनेक विद्वान विद्यार्थी और श्रोता मौजूद थे। यह व्याख्यान मेघराज नरेंद्र साकरिया निधि के अंतर्गत हुआ।

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