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दर्द कहाँ तक ढोयेंगे

सरिता सरस

जीवन भर शब्द पिरोयेंगे
पर दर्द कहाँ तक ढोयेंगे..?

ये कौन यहाँ से गुजरा है ?
पदचिह्न अभी तक बिखरा है ,
कुछ रूप ग़ज़ल के साए में
कुछ ख्वाब धूप के छाए में ,
सिमटी अँधियारी रातों में
कुछ ज़ख्म नदी में सोयेंगे !
जीवन भर शब्द पिरोयेंगे
पर दर्द कहाँ तक ढोयेंगे..?

है नीद उनींदी पलकों में
उम्मीदें बासी मटकों में ,
ये स्वप्न सुनहरे मैले से
उठ जाग मुसाफिर सपनों से ,
जो बीज घाव के बचे हुए
अब आसमान में बोयेंगे !
जीवन भर शब्द पिरोयेंगे
पर दर्द कहाँ तक ढोयेंगे..?

माटी के इस सुंदर तन पर
अब रूप - मोह का पहरा है ,
हर व्यक्ति अकेला खड़ा हुआ
अंतर में मातम गहरा है ,
बस इसी सत्य को पाने में
कितने जीवन हम खोयेंगे !
जीवन भर शब्द पिरोयेंगे
पर दर्द कहाँ तक ढोयेंगे..?

है आग अश्रु की धारा में
डूबी है नदी किनारा में ,
ये धुंध कहाँ तक छाएगा
क्या सत्य राह दिखाएगा ?
है मौत समंदर में ठहरी ,
यह मोह-जनित साजिश गहरी
हम इस मिट्टी की काया में
कितने जन्मों तक रोयेंगे ?
जीवन भर शब्द पिरोयेंगे
पर दर्द कहाँ तक ढोयेंगे..?

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