म.प्र. साहित्य अकादमी भोपाल द्वारा नारदमुनि पुरस्कार से अलंकृत

फटकार

विजयानंद विजय
"देख लेंगे हम भी...। " - बड़बड़ाते हुए नेताजी जितनी तेजी से चैंबर से बाहर निकले, उतनी ही तेजी से डीएसपी साहब भी, और बाहर आकर रामलाल पर बरस पड़े - " कितनी बार कहा है कि यहीं दरवाजे पर बैठा करो। कोई भी अंदर चला आता है।क्या करते रहते हो तुम दिन भर ? ढंग से ड्यूटी करो।कोई मुफ्त की पगार नहीं मिलती है तुम्हें ? " - पिऊन रामलाल सकपकाकर हाथ जोड़े साहब की फटकार सुनता रहा।
अभी-अभी बिटिया को घर पहुँचाकर वह ऑफिस आया था। अचानक ऐसी तबीयत खराब हुई थी बेटी की, कि आधी रात में उसे लेकर हास्पिटल जाना पड़ा। सारी रात जागते हुए बीती।और यहाँ आते ही....? ये अफसर इंसान नहीं होते।ज़ालिम होते हैं, ज़ालिम।इनके बाल-बच्चे नहीं होते। 
चुपचाप बैठा रामलाल देर तक सोचता रहा।उसका मन खिन्न हो गया था।बेटी की भी फिक्र हो रही थी।
लंच के बाद जिलाधिकारी कार्यालय में डाक पहुँचाकर जब वह लौटा, तो ऑफिस में सन्नाटा पसरा हुआ था।ऊपर साहब के चैंबर के पास आया, तो अंदर से तेज आवाजें सुनकर उसके कदम ठिठक गये। पास ही खड़े सिपाही मदन व बद्रीनाथ से उसने पूछा, तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।बस, आँखों से कुछ इशारा किया जिसे रामलाल समझ नहीं पाया।मगर जब उसकी नजर वहीं खड़े एसपी साहब के बॉडीगार्ड पर गयी, तो उसे सब समझ में आ गया। अचानक उसके कान हाथी के कान जितने बड़े हो गये।
रामलाल दरवाजे पर रखी अपनी स्टूल पर जमकर बैठ गया।उसका तनाव काफ़ूर हो गया था।अंदर से आती एसपी साहब की तेज आवाजें सुनकर अब उसे बड़ा सुकून मिल रहा था।

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