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हिन्दी के लिए लड़ने वाला पहला तमिल : चक्रवर्ती राजगोपालाचारी

पुण्य स्मरण-

चक्रवर्ती राजगोपालाचारी

भारत के एक मात्र गवर्नर जनरल, मद्रास राज्य के मुख्यमंत्री, प.बंगाल के प्रथम राज्यपाल, भारत के गृहमंत्री, प्रतिष्ठित वकील, लेखक और भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सर्वप्रथम सम्मानित चक्रवर्ती राजगोपालाचारी( 10.12.1878- 25.12.1972) द्वारा दक्षिण में हिन्दी की प्रतिष्ठा के लिए किए गए ऐतिहासिक कार्य सदा स्मरण किए जाएंगे। महात्मा गांधी की प्रेरणा से डॉ. सी.पी.रामास्वामी अय्यर की अध्यक्षता में और एनी बीसेंट के सहयोग से 1918 में ही मद्रास में ‘दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा’ की स्थापना हो गई। इस संस्था के स्थानीय सहयोगी चक्रवर्ती राजगोपालाचारी थे। वे उस समय गांधी जी की ओर से वहाँ हिन्दी- प्रचार का काम भी देख रहे थे। गांधी जी को विश्वास था कि पूरे देश को एकता के सूत्र में बांधने की क्षमता सिर्फ हिन्दी में ही है। इसीलिए हिन्दी के प्रचार के लिए गांधी जी ने अपने बेटे देवदास को मद्रास भेजा। मद्रास में राजगोपालाचारी के घर पर रह कर ही शुरुआत में देवदास ने हिन्दी के प्रचार का काम संभाला। इसी दौरान चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जी की बेटी लक्ष्मी के संपर्क में देवदास आए और बाद में उनकी शादी हुई। दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा के पहले प्रचारक देवदास गांधी ही थे।

चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को संक्षेप में राजा जी कहकर भी पुकारा जाता है। राजा जी ने 1929 में ही दक्षिण की जनता को सुक्षाव दिया कि “हिन्दी भावी भारत की राजभाषा है, हमें अभी से उसे जरूर सीख लेनी चाहिए।” ( हिन्दू, 4.2.1929) उनका विचार था कि “राजनीतिक, सामाजिक तथा व्यावसायिक, सभी दृष्टियों से हिन्दी दक्षिण भारत के विद्यालय पाठ्यक्रम का एक आवश्यक अंग होनी चाहिए। दक्षिण भारत के लिए संभव नहीं कि वह आने वाले स्वराज में मताधिकार से वंचित रहे। सभी दक्षिण भारतीयों को हिन्दी सीखनी ही चाहिए, क्योंकि अगर भारत में किसी भी प्रकार की जनतांत्रिक सरकार बनेगी तो केवल हिन्दी ही राजभाषा हो सकेगी।” ( हिन्दी प्रचारक, मार्च 1929, पृष्ठ-70) 

राजा जी दक्षिण के ऐसे पहले व्यक्ति हैं जिनके नेतृत्व में 14 जुलाई 1937 को मद्रास प्रेसीडेंसी में कांग्रेस की सरकार बनी और राजा जी मुख्यमंत्री बने। मुख्यमंत्री बनते ही 21 अप्रैल 1938 को उन्होंने अपने प्रान्त के माध्यमिक विद्यालयों में हिन्दुस्तानी ( हिन्दी ) का शिक्षण अनिवार्य कर दिया। उन्होंने कहा कि, “मद्रास के दोनो सदनों ने अच्छी तरह विचार करने के पश्चात हिन्दुस्तानी को प्रचलित करने के पक्ष में मत दिया है। यदि हम सदनों के मतों को कार्य रूप में परिणत नहीं करते तो हम अपने कर्तव्य से विमुख होते हैं और इस योग्य नहीं हैं कि सरकार में रहें।” ( बंबई सार्वजनिक सभा,1938, उद्धृत, ‘हिन्दी : राष्ट्रभाषा से राजभाषा तक’, पृष्ठ-82) 

उन्होंने स्पष्ट किया कि “सरकार की नीति इस संबंध में केवल यह है कि हिन्दी का, जो भारत के अधिकाँश भागों में बोली जाती है-काम चलाऊ ज्ञान हो जाय, ताकि इस प्रदेश के विद्यार्थी इस योग्य हो जाएं कि दक्षिण तथा उत्तर में सुविधापूर्वक विचार-विनिमय कर सकें।” ( मद्रास विधान सभा, 21।3।1938, उद्धृत, ‘राष्ट्रभाषा से राजभाषा तक’, पृष्ठ-82) 

उन दिनों राज्य में स्वाभिमान आंदोलन का नेतृत्व कर रहे ईवी रामासामी पेरियार की जस्टिस पार्टी विपक्ष में थी। उसने इसका विरोध करने का फैसला किया। जस्टिस पार्टी और मुस्लिम लीग ने मिलकर तमिझ पदाई (तमिल ब्रिगेड) तैयार की, जिसने त्रिची से मद्रास तक 42 दिनों की पदयात्रा निकाली। यह यात्रा एक अगस्त से 11 सितंबर 1938 तक चली थी। अपने रास्ते में यह यात्रा 239 गांवो और 60 क़स्बों से गुज़री थी। एक मोटे अनुमान के मुताबिक़ इस लंबी पदयात्रा में 50 हज़ार लोग शामिल हुए थे। आन्दोलन को व्यापक बनाने किए ब्राह्मण विरोधी सेन्टीमेंट को खूब उभारा गया। प्रचारित किया गया कि हिन्दी और संस्कृत के माध्यम से तमिल को दबाया जा रहा है। उनके नारों में, 'आर्य हँस रहे हैं और तमिल रो रहे हैं' और 'ब्राह्मण समुदाय मातृभाषा तमिल की हत्या कर रहे हैं', जैसे उत्तेजक नारे शामिल थे। 

देखते ही देखते पूरे प्रदेश में हिन्दी-विरोधी आंदोलन फैल गया। यह आन्दोलन तीन साल तक चलता रहा। इस दौरान जगह जगह हिंदी-विरोधी सभाएं आयोजित होती रहीं। महिलाएं भी इसमें बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रही थीं। महिलाओ की ही एक सभा में ईवी रामास्वामी नायकर को 'पेरियार' (महान) की उपाधि से सम्मानित किया गया था। पेरियार ने 'तमिलनाडु केवल तमिलों के लिए' का नारा दिया और उन्होंने एक अलग, संप्रभु द्रविड़ राष्ट्र की मांग तक कर डाली। 

किन्तु राजा जी और शिक्षा मंत्री सुब्रायन ने इस आन्दोलन का डटकर मुकाबला किया। विरोधियों की गिरफ्तारी शुरू हो गई। 1198 व्यक्ति गिरफ्तार हुए, जिनमें से 1179 को जेल की सजा हुई। जेल जाने वालों में 73 महिलाएं और 32 बच्चे थे जो अपनी माताओं के साथ थे। महिलाओं को भड़काने के आरोप में ईवी रामासामी पेरियार को 1000 रूपए का अर्थदंड और एक वर्ष के सश्रम कारावास की सजा हुई किन्तु स्वास्थ्य संबंधी कारणों से छह महीने बाद ही अर्थात् 22 मई 1939 को उन्हें रिहा कर दिया गया। इस आन्दोलन में थालामुथु नाडार तथा नटरासन नाम के दो आन्दोलनकारी मारे गए। 

मद्रास प्रेसीडेंसी में हिंदी विरोध का यह आंदोलन तब जाकर ख़त्म हुआ, जब अक्टूबर 1939 में भारत को दूसरे विश्व युद्ध में घसीटे जाने के ख़िलाफ़ राजा जी ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया। इसके बाद अंग्रेज गवर्नर लॉर्ड अर्सकाइन ने 21 फरवरी 1940 को फैसला वापस ले लिया। उसका तर्क था कि '’हिंदी को अनिवार्य बनाने के फ़ैसले से इस सूबे में बहुत मुश्किलें पैदा हो रही हैं। ये फ़ैसला राज्य की जनभावना के निश्चित रूप से ख़िलाफ़ है।'’ इससे तत्काल आंदोलन तो थम गया किन्तु नेताओं को हिन्दी विरोध के राजनीतिक रंग का चस्का लग चुका था जिसका असर बाद में भी समय- समय दिखाई देता रहता है। 

तमिलों का हिंदी- विरोध 1949 में होने वाली संविधान सभा की बैठकों में भी देखा गया। उस समय टी.टी. कृष्णमाचारी और एन. गोपालस्वामी आयंगर जैसे नेताओं ने हिंदी को 'राष्ट्रभाषा' घोषित करने से संविधान सभा को रोका। मुख्य रूप से उन्ही के विरोध के कारण राजभाषा के मसले को अगले 15 साल, यानी 1965 तक के लिए टाल दिया गया। 

इसी बीच 1949 में सी.एन.अन्नादुराइ ने ई.वी.रामासामी पेरियार की पार्टी द्रविड़ कड़गम से अलग होकर नई पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम बना ली थी। एम. करुणानिधि भी पेरियार से अलग होकर उनके साथ हो गए। यह नई पार्टी भी हिन्दी को लेकर अपने पुराने रुख पर कायम रही। हिन्दी विरोधी सम्मेलनों व हिन्दी- विरोध दिवस मनाने का सिलसिला जारी रहा। जैसे ही पंद्रह वर्ष की अवधि नजदीक आने लगी, डीएमके नेता सी.एन. अन्नादुराइ ने 1963 में घोषणा की कि, '’ये तमिल लोगों का कर्तव्य है कि वे हिंदी थोपने वालों के ख़िलाफ़ जंग लड़ें।'’ 

संसद में 1963 में राजभाषा विधेयक पेश किया गया। डीएमके नेता अन्नादुराइ उस समय राज्यसभा सांसद थे। उन्होंने संसद में इसका विरोध किया। जब यह विधेयक पास हो गया तो मद्रास राज्य की सड़कों पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। जैसे-जैसे 26 जनवरी, 1965 का दिन करीब आता गया विरोध प्रदर्शनों में तेजी आती गई। यह पूरा आन्दोलन राजनीतिक था। डीएमके नेता दोराई मुरुगन उन पहले लोगों में से थे, जिन्हें तब के मद्रास शहर के पचाइ अप्पन कॉलेज से गिरफ़्तार किया गया था। मुरुगन बताते हैं कि, "हमारे नेता सी.एन. अन्नादुराई 26 जनवरी को सभी घरों की छत पर काला झंडा देखना चाहते थे। चूंकि इसी दिन गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम भी थे, इसलिए उन्होंने तारीख बदलकर 25 जनवरी कर दी थी। इस आन्दोलन में हज़ारों लोग गिरफ़्तार किए गए थे। मदुरई में विरोध प्रदर्शनों ने हिंसक रूप ले लिया। स्थानीय कांग्रेस दफ्तर के बाहर एक हिंसक झड़प में आठ लोगों को ज़िंदा जला दिया गया। 25 जनवरी को 'बलिदान दिवस' का नाम दिया गया।" डीएमके के नेतृत्व में चलने वाले इस आन्दोलन में बड़ी संख्या में निर्दोषों ने जान गंवाई। तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के आश्वासन के बाद ही शांति वापस आ सकी। 

तमिलनाडु का हिन्दी से विरोध का पहला कारण यह है कि तमिल अपनी भाषा को संस्कृत से भी पुरानी मानते हैं। इसलिए यदि कोई भी भाषा राष्ट्र भाषा बन जाये तो वहां उसका विरोध होना निश्चित है। हिन्दी के विरोध के नाम पर वहां तमिल अस्मिता भड़काकर कभी भी आन्दोलन चलाया जा सकता है। तमिलों की हिन्दी विरोधी ग्रंथि को गांधी जी समझ रहे थे। संभवतः इसीलिए उन्होंने ही सबसे पहले दक्षिण भारत में हिंदी को प्रचारित करने का बीड़ा उठाया था। दक्षिण और उत्तर भारत के बीच की खाई को दूर करने के लिए महात्मा गांधी शुरू से ही चिंतित थे। 1915 में ही उन्होंने अपने साबरमती आश्रम में काम करने वाले तिरुनेल्वेलि के हरिहर शर्मा और मद्रास के शिवराम शर्मा को हिंदी सीखने के लिए प्रयाग भेजा, जहां राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन की देख-रेख में चल रहे हिंदी साहित्य सम्मेलन से उन्होंने हिंदी सीखी। 

9 फरवरी 1936 को मद्रास ( चेन्नई ) के टी नगर में मद्रास के मेयर अब्दुल हमीद खां ने दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा के भवन की नींव रखी और 7 अक्टूबर 1936 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भवन का उद्घाटन किया। यह भवन आज भी टी नगर में है और सभा अपना काम जारी रखे हुए है। राजा जी के अतिरिक्त कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पट्टाभि सीतारमैया, नागेश्वर राव, श्रीनिवास आयंगर जैसे दक्षिण के अनेक बड़े नेता इस सभा से जुड़े रहे। मृत्युपर्यंत गांधी जी इसके अध्यक्ष बने रहे। बाद में बाबू राजेंद्र प्रसाद, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, पी.वी. नरसिंहा राव सहित कई नेता इसके अध्यक्ष रहे। 

चक्रवर्ती राजगोपालाचारी का जन्म मद्रास प्रेसीडेंसी के सलेम जिले के थोरापल्ली गाँव में एक धार्मिक आयंगर परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम चक्रवर्ती वेंकटआर्यन और माता का नाम सिंगारम्मा था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा थोरापल्ली में ही हुई। जब वे पांच वर्ष के थे तो उनका परिवार होसुर चला गया जहाँ से उन्होंने मैट्रिकुलेशन की परीक्षा सन 1891 में पास की। 1894 में उन्होंने बैंगलोर के सेंट्रल कॉलेज से ग्रेजुएशन किया और इसके बाद प्रेसीडेंसी कॉलेज मद्रास से उन्होंने कानून की पढाई की। 

सन 1900 के आस-पास उन्होंने वकालत प्रारंभ की। इसी दौरान बाल गंगाधर तिलक से प्रभावित होकर उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य बन गए। राजनीति में आने के बाद वे पहले सलेम नगर पालिका के सदस्य और बाद में अध्यक्ष चुने गए। कांग्रेस में उनकी गतिविधियाँ तेजी से बढ़ने लगीं और वे कलकत्ता (1906) और सूरत (1907) में होने वाले कांग्रेस के अधिवेशनों में हिस्सा लिया। 

1919 में जब गाँधी जी ने रौलट ऐक्ट के विरुद्ध सत्याग्रह आन्दोलन आरंभ किया तो उन्हीं दिनों वे गाँधी जी के सम्पर्क में आये। गांधी जी का उनपर व्यापक प्रभाव पड़ा। गाँधी जी ने भी उनकी प्रतिभा को पहचाना और उनसे मद्रास में सत्याग्रह के नेतृत्व का आह्वान किया। उन्होंने पूरी निष्ठा से मद्रास सत्याग्रह आन्दोलन का नेतृत्व किया और गिरफ्तार होकर जेल गये। जेल से छूटने के बाद उन्होंने अपनी वकालत सहित दूसरी सुख सुविधाओं का त्याग कर दिया और पूर्ण रूप से देश के स्वाधीनता आन्दोलन से जुड़ गए। 

1921 में वे कांग्रेस के सचिव चुने गए। इसी वर्ष गांधी जी ने नमक सत्याग्रह आरंभ किया। इस आन्दोलन के तहत उन्होंने जनजागरण के लिए पदयात्रा की और वेदयासम के सागर तट पर नमक क़ानून का उल्लंघन किया। परिणामस्वरूप उन्हें गिरफ्तार कर पुन: जेल भेज दिया गया। इस समय तक गांधी जी के वे प्रिय सहयोगी बन चुके थे। यद्यपि कई अवसर ऐसे भी आये, जब राजा जी, गाँधी जी और कांग्रेस के विरोध में आ खड़े हुए, किंतु इसे भी उनकी दूरदर्शिता और उनकी कूटनीति का ही एक अंग समझा गया। 

1930-31 में जब असहयोग आन्दोलन शुरू हुआ तो उसमें भी राजा जी ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया और जेल गये। उनकी सूझबूझ और राजनीतिक कुशलता का उदाहरण उस अवसर पर देखने को मिलता है, जब हरिजनों के पृथक् मताधिकार को लेकर गांधी जी और डॉ. भीमराव अंबेडकर के बीच मतभेद उत्पन्न हो गये थे। एक ओर जहाँ गाँधी जी इस संदर्भ में अनशन पर बैठ गये थे, वहीं अंबेडकर भी पीछे हटने को तैयार नहीं थे उस समय राजा जी ने उन दोंनों के बीच बड़ी ही चतुराई से समझौता कराकर विवाद को शांत कराया था। 

गाँधी जी से राजा जी की निकटता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि जब भी गाँधी जी जेल में होते थे, उनके द्वारा संपादित पत्र 'यंग इंडिया' का सम्पादन राजा जी ही करते थे। जब कभी गाँधी जी से पूछा जाता था, 'जब आप जेल में होते हैं, तब बाहर आपका उत्तराधिकारी किसे समझा जाए?' तब गाँधी जी बड़े ही सहज भाव से कहते, 'राजा जी, और कौन?' गाँधी जी और राजा जी के संबंधों में तब और भी अधिक प्रगाढ़ता आ गयी जब सन् 1933 में राजा जी की पुत्री और गाँधी जी के पुत्र वैवाहिक बंधन में बंध गये। 

1937 के चुनाव के बाद मद्रास प्रेसीडेंसी में राजा जी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी। लगभग तीन साल बाद कांग्रेस के निर्देश पर उन्होंने इस्तीफा दिया। उन्हें दिसम्बर 1940 में गिरफ्तार कर एक साल के लिए जेल भेज दिया गया। उन्होंने 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन का विरोध किया और ‘मुस्लिम लीग’ के साथ संवाद की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने विभाजन के मुद्दे पर जिन्ना और गाँधी के बीच बातचीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

15 अगस्त 1947 को देश की आजादी के साथ-साथ बंगाल भी दो हिस्सों में बंट गया। राजा जी को पश्चिम बंगाल का प्रथम राज्यपाल बनाया गया। इसके अलावा भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल माउंटबेटन की अनुपस्थिति में राजा जी 10 नवम्बर से 24 नवम्बर 1947 तक कार्यकारी गवर्नर जनरल रहे और फिर बाद में माउंटबेटन के जाने के बाद जून 1948 से 26 जनवरी 1950 तक गवर्नर जनरल रहे। इस प्रकार राजा जी न केवल अंतिम बल्कि प्रथम भारतीय गवर्नर जनरल भी रहे। 

सन 1950 में नेहरू ने राजा जी को अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया जहाँ वे बिना किसी मंत्रालय के मंत्री थे। सरदार पटेल के निधन के पश्चात उन्हें गृह मंत्री बनाया गया जिस पद पर उन्होंने 10 महीने कार्य किया। प्रधानमंत्री नेहरु के साथ बहुत सारे मुद्दों पर मतभेद होने के कारण अंततः उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया। 

जनवरी 1957 में उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया और मुरारी वैद्य तथा मीनू मसानी के साथ मिलकर सन 1959 में एक नए राजनीतिक दल ‘स्वतंत्रत पार्टी’ की स्थापना की। बाद में एन। जी। रंगा, के। एम। मुंशी और फील्ड मार्शल के। एम। करिअप्पा भी इसमें शामिल हुए। स्वतंत्रत पार्टी 1962 के लोक सभा चुनाव में 18 और 1967 के लोक सभा चुनाव में 45 सीटें जीतने में कामयाब रही और तमिलनाडु समेत कुछ अन्य राज्यों में भी उसका प्रभाव रहा। 

उल्लेखनीय यह है कि जबतक राजा जी काँग्रेस से जुड़े रहे तबतक हिन्दी के पक्ष में लड़ते रहे किन्तु जैसे ही उन्होंने कांग्रेस से त्यागपत्र दिया, वे हिन्दी- विरोधी हो गए। यहाँ तक कि उन्होंने हिन्दी को देश की बहुसंख्यक जनता की भाषा मानने से भी इनकार कर दिया और उसे एक ‘क्षेत्रीय भाषा’ कहकर उसके महत्व को कम करके आंका। उन्होंने अपने पत्र ‘स्वराज्य’ के जनवरी 1968 के अंक में लिखा, “हिन्दी इज स्ट्रिक्टली स्पीकिंग ओनली ए रिजनल लैंग्वेज एण्ड नॉट द लैंग्वेज ऑफ ऑवर पीपुल स्प्रेड इवेनली आल ओवर कंट्री।” उन्होंने अंग्रेजी को यथावत जारी रखने का समर्थन किया और कहा, “द ऑफिसियल लैंग्वेज अमेंडमेंट बिल इज एन एम्पटी गिफ्ट टू द नॉन हिन्दी रीजन्स।” इससे पता चलता है कि दक्षिण का हिन्दी विरोध पूरी तरह राजनीतिक है और जिसे भी दक्षिण की राजनीति में सफल होना है उसे हिन्दी विरोध का अस्त्र अपनाना ही होगा। 

राजा जी का विवाह वर्ष 1897 में अलामेलु मंगम्मा के साथ संपन्न हुआ। उनके तीन पुत्र और दो पुत्रियाँ थीं। सन 1916 में ही मंगम्मा का स्वर्गवास हो गया। जिसके बाद राजा जी ने ही अपने बच्चों के पालन-पोषण का दायित्व निभाया। 

नवम्बर 1972 में राजा जी का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा और 17 दिसम्बर 1972 को उन्हें मद्रास गवर्नमेंट हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया, जहाँ उन्होंने 25 दिसम्बर को अंतिम सांसें लीं। 

राजा जी तमिल और अंग्रेज़ी के प्रतिष्ठित लेखक थे। 'गीता' और 'उपनिषदों' पर उनकी टीकाएं प्रसिद्ध हैं। सन 1958 में उन्हें उनकी पुस्तक ‘चक्रवर्ती थिरुमगन’ के लिए तमिल का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। भारत सरकार ने उन्हें सन 1955 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया। भारत रत्न पाने वाले वे पहले व्यक्ति थे।

*डॉ. अमरनाथ
( लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं.)
(साभार- वैश्विक हिंदी सम्मेलन ,मुंबई)

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