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वक़्त की तरकश से कोई तीर न चलने पाए


✍️सोनल पंजवानी

वक़्त की तरकश से कोई तीर न चलने पाए

मेरी खुशियों का समा ऐसे न ढलने पाए

 

वक़्त की शाख़ से अब लम्हे न लुटने पाए

मेरे हाथों से तेरा दामन न अब छुटने पाए

 

कितनी उम्मीद से माँगी है ये रौशनी की मुराद

इन आँधियों से चरागात न बुझने पाए

 

वक़्त ने डाल दिया पल पल का हिसाब इस चेहरे पर

मेरी आँखों से वो मंज़रे जज़्बात न खोने पाए

 

किसी से दिल क्या लगा बैठे ये दस्तूर हो गया

दिल किसी सूरत में अब आबाद न होने पाए

 

अपनी आँखों के चराग़ों को जो रौशन कर दे

वो तरन्नुम वो नज़ारे न कहीं खोने पाए।

 

*निपानिया, इंदौर

 


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