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हिंदी-विकास के लिए निष्पक्षता जरूरी : डॉ. दिलीप धींग



चेन्नई। अंतरराष्ट्रीय प्राकृत अध्ययन व शोध केन्द्र के निदेशक साहित्यकार डॉ. दिलीप धींग ने कहा कि हिंदी साहित्य की समृद्धि में जैन साहित्यकारों का बुनियादी योगदान है। यह योगदान हिंदी के आदिकाल से लेकर वर्तमानकाल तक निरंतर बना हुआ है। श्री प्राज्ञ स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बिजयनगर (अजमेर, राजस्थान) के तत्वावधान में हिंदी सप्ताह के अंतर्गत 19 सितंबर शनिवार को 'जैन साहित्यकारों का हिंदी साहित्य को योगदान' विषय पर अपने ई-व्याख्यान में डॉ. धींग ने कहा कि जैन साहित्य एवं जैन साहित्यकारों के अनुपम योगदान की उपेक्षा के कारण हिंदी भाषा और साहित्य का बहुत नुकसान हुआ है। कुछ हिंदी पंडित यह समझते हैं कि वे और उनके लोग जो लिखते हैं, वही साहित्य है, दूसरा तो 'असाहित्य' हैपहले से ही अनेक चुनौतियाँ झेल रहे हिंदी-जगत को हिंदी के विकास और विस्तार के लिए उदार, निष्पक्ष और बहुआयामी होना चाहिये


डॉ. धींग ने कहा कि हिंदी को सिर्फ संस्कृत-सुता कहना अर्द्धसत्य है हिंदी संस्कृत और प्राकृत, दोनों की बेटी है। प्राकृत के ही अठारह बोली विधानों के संदर्भ में महाकवि सुब्रह्मण्य भारती ने भारतमाता को 18 भाषाएँ बोलने वाली कहा था। निदेशक डॉ. नवलसिंह जैन के एक प्रश्न के उत्तर में डॉ. धींग ने कहा कि संतों के मौलिक प्रवचनों का भी हिंदी साहित्य में समादर होना चाहिये। पिछले 77 वर्षों से निरंतर प्रकाशित होने वाली बहुप्रचारित हिंदी मासिक पत्रिका 'जिनवाणी' के प्रधान संपादक डॉ. धर्मचंद जैन ने डॉ. धींग के व्याख्यान को उत्तम बताया। सचिव सुरेन्द्र पीपाड़ा ने कहा कि प्राज्ञ शिक्षा संस्थानों में डॉ. धींग के सुझावों पर अमल करने की कोशिश करेंगे। ज्योति कांकरिया की सरस्वती वंदना से शुरू हुए व्याख्यान का संचालन गार्गी त्रिपाठी ने किया।


 


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