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तुम मानो या न मानो



✍️डा•रघुनाथ मिश्र 'सहज'


तुम मानो या न मानो मैं तो,दिल की बात सुनाता हूँ।
इसीलिये सारी दुनिया में ,मैं साफ हृदय कहलाता हूँ।

दोस्त मिरे औ घर वाले सब,मन ही मन में हरसाते हैं,
जब-जब भी मैं स्वार्थ मुक्त हो,कष्टों में भी मुस्काता हूँ।

हाड़-मास का पुतला मैं भी,मानव धर्म निभाने को मैं,
पूरी कोशिश करके आखिर,खुद को इस तरह बनाता हूँ।

चाहे कुछ भी कर ले कोई,पर इतनी समझ जरुरी है,
जस करनी तस ही भरनी है बस,यही सत्य समझाता हूँ।

'सहज' कहूँ मैं बात अनुभवों की जो, यह लाख टके की है,
असली मानव हो जावो सच है, ये नहीं भरमाता हूँ"।


*कोटा (राजस्थान)


 


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