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कभी पत्थर नहीं लड़ते



✍️कैलाश सोनी सार्थक
लड़ा है आदमी से आदमी खंजर नहीं लड़ते
हमारी सोच लड़ती है कभी पत्थर नहीं लड़ते


दुखी हैं लोग वो ही भागते धन के लिए अक्सर
बहुत है पास धन जिनके सुखों से तर नहीं लड़ते


नहीं हमको लड़ाती हैं किताबों में लिखी बातें
समय हमको लड़ाता है कभी अक्षर नहीं लड़ते


थका इंसान अपनी नींद काँटों पर करे पूरी
कहाँ कब कौन सोएगा कभी बिस्तर नहीं लड़ते


हमारी नीतियों ने जातियों का भेद है डाला
खुदा या ईश,गुरु नानक,कभी ईश्वर नहीं लड़ते


डरे सहमें सदा रहते लड़ेंगे क्या किसी से वो
सदा तैयार रहते वो कभी कहकर नहीं लड़ते


हमारी खूबियाँ लड़ती रही पद के लिए सोनी
कभी किस्मत नहीं लड़ती,कभी अवसर नहीं लड़ते

*नागदा जिला उज्जैन


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