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भावना के पुष्प



✍️सुषमा दीक्षित शुक्ला


ये भावना के पुष्प सादर ,
प्रभु  समर्पित है तुम्हें।


प्रेम धागे में पिरो कर ,
कर  रही अर्पित तुम्हें ।


है कामना अब तो प्रभू ,
कोई ना हमसे भूल हो।


अब  प्रेम की गंगा बहे ,
ना नफरतों के शूल हों।


ये कठिन जीवन अग्निपथ,
ना भटक जाऊँ ज्ञान दो ।


बस नेक रस्तों पर चलूँ ,
हरदम तुम्हारा ध्यान हो ।


हम तुम्हारे शिशु प्रभू,
तुम पिता अरु  मातु हो ।


बालक अगर कपूत है ,
माता नही कुमातु हो ।


सुन हे! प्रभु परमात्मा ,
तुमसे  मेरी  याचना ।


निज प्यार से मत दूर कर ,
तेरी शरण की कामना।


 


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