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महतो टोला



✍️शिवानन्द सिंह 'सहयोगी'

 

दुःख की ‘दालमोठ’ खाते हैं,

आसमान की बालकनी में,

बैठे छुटपन-तारे |

 

पानी की टंकी के नीचे,

मधुमक्खी की भनभन,

बच्चे बीन रहे हैं गत्ते,

भूख छछनती छन-छन,

‘मुनरी’ के हाथों में चिपके,

रोटी के जुगाड़ के लासे,

महल उठाते गारे |

 

जली ‘पंचलाइट’ तो कितने

लेखक ‘रेणु’ हँसे हैं,

किसे नहीं यह ज्ञात कि कितने,

‘गोधन’ अभी फँसे हैं,

घूम रहे ‘महतो टोला’ में,

लेकर ‘बिजली-बत्ती’ झंडे,

‘लालटेन’ के नारे |

 

संसद और विधानसभाएँ,

बाँट रही हैं धंधे,

कोरोना की भेंट चढ़ो ! को,

नहीं मिले हैं  कंधे,

आश्वासन की चढ़ी कड़ाही,

तले जा रहे कई साल से,

सुख के ‘शक्करपारे’ | 

 

*गंगानगर ,मेरठ

 


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