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गुरु-वंदना



*प्रो.शरद नारायण खरे
वंदन है,शत् अभिनंदन है, हे गुरुवर नित तेरा ।
फूल बिछाये पथ में मेरे,सौंपा नया सबेरा ।।

भटक रहा था भ्रम के पथ पर,
राह दिखाई मुझको
गहन तिमिर को परे हटाया,
नमन् करूं मैं तुझको

आशाओं के सावन में है अरमानों का डेरा ।
शीश झुकाऊं हे परमेश्वर,भाग्य मेरा यूं फेरा ।।

मायूसी से मुझे निकाला,
कर दी नव संरचना
आज शिष्य यह गौरवधारी,
गुरु तेरी हीसृजना

मैं तो था अपात्र,अविवेकी,गुरु तूने ही टेरा ।
वंदन है ,शत् अभिनंदन है, हे गुरुवर नित तेरा ।।


 

जीवन महक रहा है मेरा,

राह दिखाई तूने

सूरज बनकर दिया उजाला,

भाव हुए दिन दूने

 

गीतों की गंगा बहती है,सच्चाई ने हेरा ।

वंदन है,शत् अभिनंदन है,हे गुरुवर नित तेरा ।


*मंडला(म.प्र.)

 


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