Subscribe Us

घटाएं सावन की


    


✍️अशोक 'आनन'

 

गरजें - बरसें-

घटाएं सावन की ।

 

पिया  गए परदेश -

हमारे ।

कैसे -

विरह रात गुज़ारें ?

 

आस पूर्ण कब होगी -

मन की ?

 

हम हैं -

नदिया के दो किनारे ।

मिले कभी न -

कोशिश   कर   हारे ।

 

कब बांचोगे तुम -

भाव नयन के ?

 

हर  बांध  टूट   चुका -

सब्र  का ।

गुज़र चुका मधुमास -

उम्र का ।

 

भली लगी अब -

सुधि सजन की ।

 

कभी    लौट    आता     है -

वक़्त ।

शिलाएं पिघल जाती हैं जब -

सख़्त ।

 

सच हो जाती है जब -

बात सपन की ।

 

*मक्सी,जिला - शाजापुर ( म.प्र.)

 


अपने विचार/रचना आप भी हमें मेल कर सकते है- shabdpravah.ujjain@gmail.com पर।


साहित्य, कला, संस्कृति और समाज से जुड़ी लेख/रचनाएँ/समाचार अब नये वेब पोर्टल  शाश्वत सृजन पर देखेhttp://shashwatsrijan.com


यूटूयुब चैनल देखें और सब्सक्राइब करे- https://www.youtube.com/channel/UCpRyX9VM7WEY39QytlBjZiw 



टिप्पणी पोस्ट करें

0 टिप्पणियां