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दो जून की रोटी



 

✍️सलोनी रस्तोगी

 

समय का फेर देखो, इंसान बदल गया

दो जून की रोटी के लिए, धनवान बदल गया

 

कभी देता था दो पाई, मेरी दिन भर की कमाई

आज रोटियों के साथ, तस्वीर भी खिचवाईं

 

या रे मौला दो जून की रोटी,मुफ्त में दिलाई

हम गरीबों की तकदीर की,क्या कर दी सिलाई

 

पर हाथों की लकीरें, दगा कर गई

पसीने की बूंदें सच, बयां कर गई

 

मेरी रग रग में समाया है, मेहनत से कमाना

पसीना बहा कर ही, दो जून की रोटी खाना।

 

*जयपुर, राजस्थान।


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