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दिनों का फेर



 *रश्मि वत्स

फुरसत नही हुआ करती थी ,
भाग-दौड़ भरी जिन्दगानी थी ।
वो भी क्या दिन थे यारों जब,
इंतज़ार करते थे हम इतवार की ।

वक्त-वक्त की बात है,
सब दिनों का फेर है ।
कल तक चहलपहल थी जीवन में,
आज रुका सारा खेल है ।

करोना की मार से जूझ रहा देश है,
घर बैठे बस भेज रहे संदेश हैं।
न मिलना न जुलना किसी से ,
बदल गया परिवेश है ।

सूनी सड़कें, सूनी गलियाँ, बंद हुए बाजार हैं,
इस महामारी ने बंद किए व्यापार हैं ।
नही सूझ रहा करने को कुछ भी,
ये  समय की कैसी मार है ।

करोना से अर्थव्यवस्था भी हुई कमजोर है,
इस विकट संकट से जूझ रहा देश है।
आओ स्वदेशी को अपनाकर हमसभी,
लें संकल्प ,देश को विकसित करते हैं।
*मेरठ (उत्तर प्रदेश)


 


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