Subscribe Us

ऐसे कहां हमारे भाग ?



*अशोक 'आनन' 

 

मगरे पर आकर -

बोले    काग  ।

ऐसे  कहां  हमारे  भाग ?

 

कच्चा         घर -

टूटा       खपरैल ।

जीना  ,   है    न  -

बच्चों का  खेल ।

 

बुझ  जाए - 

पेटों की आग ।

ऐसे  कहां  हमारे  भाग ?

 

थिगड़ैलों      से -

तन   कैसे   ढाॅंकें ?

उनमें  से  अब -

यौवन      झाॅंके ।

 

चुनरी         में -

न  लागे  दाग़ ।

ऐसे  कहां  हमारे  भाग ?

 

झांके    घर    की   -

हड्डी  -  पसली ।

घर से सपनों की -

अर्थी    निकली ।

 

डसें    कभी    न -

दुर्दिन  के  नाग ।

ऐसे  कहां  हमारे  भाग ?

 

भूख़     -      पर्व

यों     बीते     हैं ।

आंसू   पी  -  पी -

हम   जीते    हैं ।

 

हमें    छोड़    दे  -

मौसम     घाघ  ।

ऐसे  कहां  हमारे  भाग ?

 

चौंका  -    चूल्हा  -

बद    से    बद्तर ।

रीता     -

आटे का कनस्तर ।

 

फ़िर   उजडें    न  -

खुशियों के बाग ।

ऐसे  कहां  हमारे  भाग ?

 

*मक्सी ,जिला - शाजापुर ( म.प्र.)

 


अपने विचार/रचना आप भी हमें मेल कर सकते है- shabdpravah.ujjain@gmail.com पर।


साहित्य, कला, संस्कृति और समाज से जुड़ी लेख/रचनाएँ/समाचार अब नये वेब पोर्टल  शाश्वत सृजन पर देखेhttp://shashwatsrijan.com


यूटूयुब चैनल देखें और सब्सक्राइब करे- https://www.youtube.com/channel/UCpRyX9VM7WEY39QytlBjZiw 



टिप्पणी पोस्ट करें

0 टिप्पणियां