म.प्र. साहित्य अकादमी भोपाल द्वारा नारदमुनि पुरस्कार से अलंकृत

दूर तक अब भी तन्हाइयों के सिलसिले हैं



*पूजा झा
दूर तक अब भी तन्हाइयों के सिलसिले हैं
मत पूछ किस कदर इक दूजे से गिले हैं।


देती है दस्तक यादों के काफिले फिर दर पे
आज फिर बेसब्र होके हम इनमें घुले हैं।


सोचा था ना यूँ टूटने देंगे अब खुद को
भूल गए मगर हम भी मिट्टी के बने हैं।


बयां करना बखूबी आता है दर्द हमें भी
मजबूरियों के नाम पे होंठ  ये सिले हैं।


रिश्तों के बाजारों की रौनक तो देखिए
हर शय भीड़ में भी तन्हा ही मिले हैं।


*जंदाहा,हाजीपुर(वैशाली)


 


अपने विचार/रचना आप भी हमें मेल कर सकते है- shabdpravah.ujjain@gmail.com पर।


साहित्य, कला, संस्कृति और समाज से जुड़ी लेख/रचनाएँ/समाचार अब नये वेब पोर्टल  शाश्वत सृजन पर देखेhttp://shashwatsrijan.com


यूटूयुब चैनल देखें और सब्सक्राइब करे- https://www.youtube.com/channel/UCpRyX9VM7WEY39QytlBjZiw 


एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ