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कर शरारत मुस्कुराएगा कभी



*हमीद कानपुरी

 

कर शरारत मुस्कुराएगा कभी।

अश्क बनकर झिलमिलाएगा कभी।

 

पास  आकर  दूर  जाएगा कभी।

ख्वाब में आकर सताएगा कभी।

 

दूर  से  ठेंगा दिखाएगा कभी।

बात  दिल की  आ सुनाएगा कभी।

 

रूठने  का   है अलग अंदाज कुछ,

दूर  ज़्यादा   रह न  पाएगा  कभी।

 

तीरगी  का   दूर   होना   लाजिमी,

बल्ब  कोई   आ  जलाएगा  कभी।

 

इश्क़ का  होने लगा उसपर असर,

अब  नहीं  नजरें   चुराएगा  कभी।

 

इक  धरोहर   छोड़ जाएंगे  हमीद,

गीत  ग़ज़लें   कोई  गाएगा  कभी।

 

*हमीद कानपुरी

 


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