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उलझे हुए जीवन की लाचारियों में खोया हूं



*विक्रम कुमार*


उलझे हुए जीवन की लाचारियों में खोया हूं


भूला नहीं हूं दोस्त जिम्मेदारियों में खोया हूं

 

हमने साथ जो गुजारे थे वो जमाने अब नहीं 

पहले से वो फुरसतों के दिन पुराने अब नहीं 

उलझे हुए अब हम भी हैं व्यस्त हो तुम भी

बचपने भरे हुए वो दिन सुहाने अब नहीं 

अब दुनिया की रची दुनियादारियों में खोया हूं

भूला नहीं हूं दोस्त जिम्मेदारियों में खोया हूं

 

मां बाप ने बड़े जतन से हम सभी को पाला है

भाई बहन के साथ ने हर पल हमें संभाला है

वो छोड़ के घर बार अपना सात जन्मों के लिए

हाथ अपना पत्नी ने हाथों में मेरे डाला है

सोचकर यही मैं रिश्तेदारियों में खोया हूं

भूला नहीं हूं दोस्त जिम्मेदारियों में खोया हूं

 

प्रेम जो था दोस्ती का वो कभी न टूटेगा

मेल दिल से दिल का ये कभी न टूटेगा

दोस्त थे दोस्त हैं दोस्त रहेंगे सदा

रिश्ता है अपना जो ये कभी न टूटेगा

अपने दिल की मैं पहरेदारियों में खोया हूं

भूला नहीं हूं दोस्त जिम्मेदारियों में खोया हूं

भूला नहीं हूं दोस्त जिम्मेदारियों में खोया हूं

 

*विक्रम कुमार

मनोरा, वैशाली






 






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