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गायन में अभिनय के बादशाह- मोहम्मद रफी(लेख)


सृष्टि के निर्माण से लेकर विध्वंस तक प्रकृति या ईश्वर जो भी कहें उसने एक निश्चित 'लय' इस कार्य के लिए निर्धारित की हुई है।  इस बात को संपूर्ण विश्व में सर्वप्रथम हमारे ऋषि-मुनियों ने जाना।  इसीलिए तो विध्वंस के लिए भी उन्होंने 'प्रलय' शब्द निर्धारित किया जिस में  भी 'लय' है। 'लय' के बग़ैर सृष्टि कभी सुचारू रूप से नहीं चल सकती। सुचारू रूप से क्या...बल्कि यह कहना उचित होगा कि चल ही नहीं सकती। ठीक इसी प्रकार जीवन भी 'लय,सुर, ताल के बग़ैर नीरस है। और इस नीरस जीवन में लय,सुर, ताल के सम्मिश्रण से बना संगीत वह रस घोलता है, जिसके प्रभाव से इंसान तो क्या, प्रकृति स्वयं झूमने लगती है।


शास्त्रीय रागों के बारे में वही चंद लोग बता सकते हैं, जिन्हें इसकी जानकारी है। बाकी लोग तो बस वही सुनना पसंद करते हैं जो उन्हे रुचिकर लगता है, या उनकी रूह को छूता है। इस मामले में जो सबसे अधिक पसंद किया जाने वाला गीत-संगीत है, वह हमारे देश का फिल्मी संगीत है, वह भी खास तौर से पचास से सत्तर के दशक का संगीत। उस समय फिल्मी दुनिया में वाक़ई एक से बढ़कर एक बेहतरीन गीतकार,संगीतकार और गायक-गायिका हुए जिनके योगदान के बग़ैर फिल्मी संगीत बिल्कुल निर्धन दिखाई देता है। इन्ही महान संगीत सितारों के दौर में एक ऐसा सितारा भी हुआ जिसके योगदान के बग़ैर फिल्मी संगीत की कल्पना भी नहीं की जा सकती। उसका नाम है हरदिल अज़ीज़,सादगी व सरलता की प्रतिमूर्ति महान गायक ज़नाब मोहम्मद रफी। 24 दिसंबर 1924 को जन्मे और 31 जुलाई 1980 को इस दुनिया से अलविदा करने वाले इस बहुत ही प्यारे इंसान ने अपने गाए गीतों के माध्यम से वह दौलत छोड़ी है जिससे सिर्फ फिल्मी दुनिया ही नहीं बल्कि भारत देश सृष्टि के विध्वंस तक मालामाल रहेगा।


मोहम्मद रफी साहब के गाए कई कालजयी गीतों के बारे में इस विषय के जानकारों, संगीतप्रेमियों द्वारा लिखा जा चुका है और लिखा जा रहा है । अतः उन गीतों की चर्चा करने से अच्छा है कि हम रफी साहब के गायन में किए गए उन मौलिक बदलावों की बात करें। जो खासियत रफी साहब के साथ-साथ किशोर कुमार,लता मंगेशकर और आशा भोसले  के गायन में भी रही है। वह विशिष्टता है "गायिकी में अभिनय।" जी हाँ... गायिकी में अभिनय की जो महारत इन चारों में थी, वैसी अन्य फिल्मी गायक या गायिका में नहीं सुनाई दी।


यूं तो  रफी साहब ने अपने समय के  लगभग सभी नायकों के लिए गीत गाए, लेकिन शम्मी कपूर के लिए गाए हुए गीतों की बात कुछ निराली है। शम्मी कपूर के लिए रफी साहब ने जितने भी गीत गाए, उन्हें सुनकर कोई भी बड़ी आसानी से कह सकता है कि यह गीत शम्मी कपूर पर फिल्माये गए हैं।  ठीक इसी प्रकार दिलीप कुमार से लेकर ऋषि कपूर तक रफी साहब ने जब भी किसी के लिए गाया, उस अभिनेता का लहज़ा,  अवश्य उभारने की कोशिश की। कुछ गीतों में थोड़ा कम उभरा होगा परंतु अधिकांश गीतों में साफ-साफ झलक उस अभिनेता की सुनाई पड़ती है, जिस पर वह गीत फिल्माया गया है।


कुछ उदाहरण यहां,जो मुझे लगता है कि इन गीतों में रफी साहब का अभिनय पूरे शबाब पर रहा। बताना चाहूंगा जैसे ऋषि कपूर पर फिल्माया फिल्म लैला-मज़नू का गीत- "तेरे दर पे आया हूँ" या फिल्म सरगम का दो गाना- "ढपली वाले ढपली बजा।" आप इन दो या ऋषि कपूर पर फिल्माये रफी साहब के किसी भी गीत को सुनिए, अभिनेता ऋषि कपूर की झलक साफ सुनाई पड़ती है। सदाबहार अभिनेता देव आनंद के लिए भी  रफी साहब ने कई गीत गाए हैं। परंतु फिल्म गाइड का गीत - "दिन ढल जाए" का जादू ऐसा है जिसके प्रभाव के आगे कोई और गीत, मेरे जेहन में ठहर ही नहीं पाता। अभिनेता देवानंद और गायक मोहम्मद रफी इस गीत में इस कदर एकाकार हुए हैं कि इन दोनो को अलग करना नामुमकिन है। ठीक इसी प्रकार फिल्म शराबी का गीत -"मुझे ले चलो आज फिर उन गलियों में।" इस गीत में भी इन दोनो को जुदा करना असंभव है।


ऐसा नहीं है कि यह कमाल सिर्फ गायक मोहम्मद रफी का है।   कोई भी संगीतकार एक उम्दा धुन बना सकता है। किसी अच्छे गीतकार से उस धुन पर गीत लिखवा सकता है।परंतु यह गायक अथवा गायिका की प्रतिभा पर निर्भर है कि वह उस गीत को किस स्तर पर ले जा सकता है। मैं यहाँ किसी का नाम नहीं लूंगा, पर फिल्मी दुनिया में ऐसे कई अत्यंत प्रभावशाली गायक-गायिका हुए हैं जिन्होंने सैकड़ो गीत गाए हैं, परंतु उन्हे सुनकर उस अभिनेता या अभिनेत्री का चेहरा ध्यान में नहीं आता, जिस पर वो गीत फिल्माया गया है अपितु वह गायक या गायिका ही याद आते हैं, जिन्होंने उसे गाया है।


अभिनेता राजेन्द्र कुमार पर फिल्माया फिल्म 'दिल एक मंदिर' का बड़ा ही प्रसिद्ध गीत है - "याद न जाए बीते दिनों की।" इस गीत में रफी साहब का कमाल देखिए कि उन्होंने अभिनेता राजेन्द्र कुमार से अपने आप को कैसा एकाकार किया है। गीत के शुरुआती बोल "याद" को ही गौर से सुनिए, वहाँ आपको रफी नहीं राजेन्द्र कुमार ही गाते हुए सुनाई देंगे। कई गीत हैं राजेन्द्र कुमार के, एक और देखिए, "तेरी प्यारी-प्यारी सूरत को किसी की नजर ना लगे चश्मे बद्दूर।"(फिल्म-ससुराल) इस गीत में खास तौर से "ना लगे, चश्मे बद्दूर" पर गौर फरमाएं, राजेंद्र कुमार ही नज़र आते हैं।


फिल्म "शोला और शबनम" अभिनेता धर्मेंद्र, गीत -"जाने क्या ढूंढती रहती है ये आँखें मुझमें।" रफी साहब का कमाल देखिए "जाने क्या" को इस तासीर के साथ निभाया है कि रोम-रोम एक अजीब-सी मदहोशी से भर जाता है। चूंकि उस समय अभिनेता धर्मेंद्र फिल्मी दुनिया में नए-नए आए युवा थे,उनकी  एक गंभीर छवि थी। बाद में जब इन्ही धर्मेंद्र के लिए "मैं जट यमला पगला दीवाना"(फिल्म-प्रतिज्ञा) के लिए गाया तो रफी और धर्मेन्द्र पूर्ण रूप से एक हो गए।


अभिनेता दिलीप कुमार के लिए भी कई गीत मोहम्मद रफी ने गाए हैं और बखूबी गाए हैं, पर हम यहाँ फिल्म मधुमती के गीत-"टूटे हुए ख़्वाबों ने" की बात करेंगे। ट्रेजेडी किंग दिलीप कुमार को इस गीत में रफी साहब ने ऐसा आत्मसात किया है कि यह गीत बेमिसाल हो गया। फिल्म "दिल दिया दर्द लिया" की ग़ज़ल "कोई सागर दिल को बहलाता नहीं।" भी एक अमर रचना है।


यू तो रफी ने राजेश खन्ना के लिए कम ही गीत गाए हैं परंतु राजेश खन्ना के शुरुआती फिल्मों में मोहम्मद रफी के ही गीत हैं जैसे "अकेले हैं चले आओ जहाँ हो" या "और कुछ देर ठहर और कुछ देर न जा" इत्यादि। बाद में भी जब राजेश खन्ना का सितारा अपनी पूर्ण बुलंदी पर था तब रफी साहब ने उनके लिए जो भी गया वह हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो गया जैसे- "युहीं तुम मुझसे बात करती हो" या फिल्म "मेहबूब की मेंहदी" के गीत। पर मैं यहाँ फिल्म "हमशक्ल" के एक डुएट्स का उल्लेख करना चाहता हूँ जो मोहम्मद रफी की जीनियस गायिकी का बेमिसााल उदाहरण है। इस फिल्म में लता मंगेश्कर के साथ रफी साहब का एक गीत है- "काहे को बुलाया मुझे बालमा प्यार के नाम से।" यह पंक्ति लता जी ने गाई है अगली पंक्ति रफी साहब की है-"राधा ने यही पूछा था एक दिन रूठ के श्याम से।" गौरतलब बात यह है कि इसमें "राधा" के उच्चारण में "धा" पर थोड़ा कम जोर दिया गया है क्योंकि अभिनेता राजेश खन्ना जब "राधा" बोलते थे तो उनका "धा" कई बार "दा" सुनाई देता है। पाठकों को यदि फर्क समझना है तो दिलीप कुमार पर फिल्माया गीत "मधुबन में राधिका नाचे रे" और इस गीत को सुनकर समझ सकते हैं कि मोहम्मद रफी सिर्फ एक गायक ही नहीं बल्कि अभिनेताओं के अभिनेता भी थे।


मोहम्मद रफी का जिक्र अभिनेता शम्मी कपूर के बिना हो ही नहीं सकता। शम्मी कपूर के दो ऐसे गीतों का उल्लेख जिसमें शम्मी कपूराना हरकतों की गुंजाइश कम थी, पर उन दोनो ही गीतों में रफी वो कमाल कर गए, जिसे सुनकर मोहम्मद रफी के प्रति सम्मान और बढ़ जाता है।


पहला गीत फिल्म जवाँ मोहब्बत से है। गीत के बोल हैं-  "जब मोहब्बत जवान होती है, हर अदा इक जुबान होती है। तुम जहां प्यार से कदम रख दो, वो जमीं आसमान होती है।" इस गीत में "जवान" के "वा" पर रफी के गले ने वो 'मेजिक' क्रिएट' किया है कि मुखड़े में चार चांद लग जाते हैं। दूसरी पंक्ति "तुम जहाँ प्यार "से" में यही 'मेजिक' क्रिएट कर 'मेस्मराइज़' कर देते हैं। दूसरा गीत फिल्म ब्रह्मचारी का है। बोल हैं- "दिल के झरोखे में तुझको बैठाकर, यादों को तेरी मैं दुल्हन बनाकर.." इस लोकप्रिय गीत में हरकत की कहीं कोई गुंजाइश नहीं है पर रफी ने गीत की पहली पंक्ति "दिल के झरोखे में तुझको बैठाकर"  के "कर" में अपने कंठ से वो हरकत दी है और फिल्मांकन में शम्मी कपूर ने भी उसे उसी अंदाज में निबाह कर गीत में एक अलग ही जान डाल दी है। गीत के अंत को छोड़कर जब भी यह पंक्ति आई है "कर" उसी अंदाज में गाया गया है।


गीत,ग़ज़ल,भजन राॅक-न-रोल से लेकर कॉमेडी सांग्ज के अलावा  रोमांटिक गीतों के तो वे बादशाह कहलाते थे। जटिल से जटिल कंपोजिशन वे सहजता, मिठास और संवेदनशीलता के साथ इस कदर निभाते थे की पंक्ति दर पंक्ति, सुनने वाले के ह्रदय  में उतर जाती है। आज उनकी पुण्यतिथि पर सिर्फ इतना ही कि मोहम्मद रफी युगों-युगों तक अमर रहेंगे। वे अब किवदंती बन चुके हैं।


*कमलेश व्यास 'कमल',20/7 कांकरिया परिसर, अंकपात मार्ग,उज्जैन 456006,मो. 08770948951


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