म.प्र. साहित्य अकादमी भोपाल द्वारा नारदमुनि पुरस्कार से अलंकृत

कीर्ति शेष- हर किरदार को ईमानदारी से जिया नाना पाटेकर ने

कीर्ति शेष-
हर किरदार को ईमानदारी से जिया नाना पाटेकर ने

सिनेमा में अभिनेता बहुत आते हैं, सितारे भी बनते हैं, लेकिन कुछ कलाकार अपनी पहचान से आगे निकलकर किरदार की पहचान बन जाते हैं। नाना पाटेकर ऐसे ही अभिनेता थे। उन्होंने अभिनय को संवाद बोलने या चेहरे पर भाव लाने तक सीमित नहीं रखा। वे किरदार के भीतर उतरते थे और उसकी पीड़ा, बेचैनी, आक्रोश और संवेदना को इस तरह प्रस्तुत करते थे कि पर्दे पर दिखाई देने वाला पात्र काल्पनिक नहीं, हमारे आसपास का कोई परिचित व्यक्ति लगता था। नाना पाटेकर का निधन भारतीय सिनेमा के लिए एक बड़े कलाकार की विदाई है। उनके साथ अभिनय की उस परंपरा का एक महत्वपूर्ण अध्याय भी समाप्त हुआ, जिसमें लोकप्रियता से अधिक विश्वसनीयता और चमक से अधिक संवेदना का महत्व था। 75 वर्ष की उम्र में उनके जाने की खबर उन लाखों दर्शकों के लिए निजी क्षति जैसी है, जिन्होंने उनके अभिनय में जीवन के अलग-अलग रंग देखे।

नाना पाटेकर का वास्तविक नाम विश्वनाथ पाटेकर था। महाराष्ट्र की धरती से निकले इस कलाकार का फिल्मी सफर संघर्षों के बीच शुरू हुआ। कोई फिल्मी विरासत उनके सामने तैयार नहीं थी। जीवन की कठिनाइयों ने उन्हें आम आदमी की दुनिया को करीब से देखने का अवसर दिया और यही अनुभव आगे उनके अभिनय की ताकत बना। उनके पात्रों में इसलिए बनावट कम और जीवन की सच्चाई अधिक दिखाई देती थी। 1978 में गमन से शुरू हुई उनकी फिल्मी यात्रा ने आगे चलकर कई पड़ाव देखे। सलाम बॉम्बे!, परिंदा, प्रहार, क्रांतिवीर, अग्निसाक्षी, खामोशी: द म्यूजिकल, अब तक छप्पन और वेलकम जैसी फिल्मों में उन्होंने एक-दूसरे से बिल्कुल अलग भूमिकाएं निभाईं। अपराध की दुनिया का कठोर चेहरा हो, व्यवस्था से लड़ता आम आदमी, संवेदनशील पात्र या हास्य से भरपूर किरदार—नाना ने हर भूमिका को उसकी अपनी प्रकृति के साथ स्वीकार किया।

परिंदा में उनका अभिनय उनके करियर की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में रहा। अपराध और रिश्तों के बीच उलझे चरित्र के भीतर के द्वंद्व को उन्होंने बेहद प्रभावी ढंग से सामने रखा। इस भूमिका के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। लेकिन उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि पुरस्कार नहीं, वह भरोसा था जो उन्होंने दर्शकों के मन में बनाया। क्रांतिवीर का प्रताप नारायण तिलक उनके अभिनय की अलग पहचान बना। व्यवस्था से क्षुब्ध और अन्याय के विरुद्ध खड़े एक आम आदमी के आक्रोश को उन्होंने ऐसी तीव्रता दी कि वह किरदार अपने समय की बेचैनी का प्रतीक बन गया। उनके संवादों में केवल शब्द नहीं थे; उनके पीछे उस व्यक्ति का संघर्ष था, जिसने व्यवस्था को स्वीकार करने के बजाय उससे सवाल करना चुना।

नाना की आवाज उनके अभिनय का खास हिस्सा थी। उसमें खुरदरापन था, ठहराव था और जरूरत पड़ने पर विस्फोट भी। वे संवादों को केवल बोलते नहीं थे, परिस्थिति के अनुरूप उनका वजन बदल देते थे। उनकी आंखें, चेहरे के भाव और देहभाषा संवादों के साथ मिलकर पात्र की मनःस्थिति रचते थे। कई बार उनकी खामोशी भी उतना ही असर छोड़ती थी जितना कोई लंबा संवाद। उनकी सबसे बड़ी खूबी थी कि उन्होंने कभी अपनी स्टार छवि को किरदार पर हावी नहीं होने दिया। नायक हो या खलनायक, कठोर हो या संवेदनशील—उन्होंने पात्र को उसकी कमजोरियों के साथ स्वीकार किया। उनके किरदार आदर्श मनुष्य नहीं थे; उनमें गुस्सा, स्वार्थ, डर, करुणा और असमंजस सब कुछ था। यही जटिलता उन्हें वास्तविक बनाती थी।

प्रहार: द फाइनल अटैक में उन्होंने अभिनय के साथ निर्देशन भी किया। सैनिक जीवन और अनुशासन को केंद्र में रखने वाली इस फिल्म में उनके व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पक्ष दिखाई देता है। भारतीय सेना के प्रति उनका सम्मान और प्रादेशिक सेना से उनका जुड़ाव भी उनके जीवन का हिस्सा रहा। उनके लिए सैनिक केवल वर्दी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और अनुशासन का प्रतीक था। फिर वेलकम का उदय शेट्टी आया और नाना की अभिनय क्षमता का एक बिल्कुल अलग रंग सामने आया। गंभीर और आक्रोशपूर्ण भूमिकाओं के लिए पहचाने जाने वाले इस अभिनेता ने हास्य में भी अपनी अलग छाप छोड़ी। उदय शेट्टी की लोकप्रियता केवल संवादों से नहीं बनी। उनकी टाइमिंग, चेहरे के भाव और संवादों के बीच का ठहराव उस किरदार को यादगार बनाते हैं। यह साबित करता है कि नाना किसी एक शैली के अभिनेता नहीं थे। तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों सहित अनेक सम्मान उनके हिस्से आए। भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया। लेकिन उनके अभिनय की असली कसौटी पुरस्कार नहीं, दर्शकों का विश्वास था। वे जानते थे कि पर्दे पर नाना पाटेकर हैं तो किरदार में कोई न कोई सच्चाई जरूर होगी। उन्होंने अपने पात्रों को आकर्षक बनाने की कोशिश नहीं की; उन्हें विश्वसनीय बनाया। जरूरत पड़ने पर कुरूपता, कमजोरी, कठोरता या हास्य—किसी से परहेज नहीं किया। यही वजह है कि उनके अभिनय में अभिनेता दिखाई देने के बजाय पात्र दिखाई देता था।

नाना पाटेकर की फिल्मों को आज फिर से देखने पर उनकी विविधता सामने आती है। परिंदा का द्वंद्व, क्रांतिवीर का आक्रोश, प्रहार का अनुशासन, खामोशी की संवेदना और वेलकम का हास्य—ये अलग-अलग रंग हैं, लेकिन इन सबके केंद्र में एक ही चीज है: अभिनय के प्रति उनकी ईमानदारी।सिनेमा में बहुत से चेहरे समय के साथ धुंधले पड़ जाते हैं। कुछ फिल्में पुरानी हो जाती हैं, कुछ संवाद अप्रासंगिक। लेकिन कुछ कलाकार ऐसे होते हैं जिनका काम समय के साथ और अर्थवान होता जाता है। नाना पाटेकर उन्हीं में थे। उनके पात्र इसलिए याद नहीं रहेंगे कि वे पर्दे पर प्रभावशाली थे, बल्कि इसलिए कि उनमें जीवन की सच्चाई थी।उनकी विदाई हमें एक ऐसे कलाकार की कमी का एहसास कराती है, जिसने अभिनेता की चमक से अधिक किरदार की गरिमा को महत्व दिया। उन्होंने साबित किया कि महान अभिनय का आधार शोर नहीं, संवेदना है; संवाद नहीं, उसके पीछे छिपा भाव है और लोकप्रियता नहीं, दर्शक के मन में बनी विश्वसनीयता है।

नाना पाटेकर अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी फिल्मों के पात्र हमारे बीच रहेंगे। उनकी आवाज संवादों में सुनाई देगी, उनकी अदाकारी नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए संदर्भ बनेगी और उनकी फिल्में बार-बार यह याद दिलाएंगी कि अभिनय तब बड़ा होता है, जब अभिनेता स्वयं पीछे हटकर किरदार को आगे कर देता है। नाना पाटेकर की सबसे बड़ी विरासत उनके पुरस्कार नहीं, वे किरदार हैं जिन्हें उन्होंने पूरी ईमानदारी से जीवन दिया। उन्होंने अभिनय किया नहीं, उसे जिया। इसलिए उनका जाना एक कलाकार की विदाई जरूर है, लेकिन उनकी कला की नहीं। नाना पाटेकर को विनम्र श्रद्धांजलि।

संदीप सृजन
संपादक- शब्द प्रवाह 

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