म.प्र. साहित्य अकादमी भोपाल द्वारा नारदमुनि पुरस्कार से अलंकृत

भोपाल के राजेन्द्र गट्टानी ने आयरलैंड में बिखेरे हास्य-व्यंग्य के देसी पंच

भोपाल के राजेन्द्र गट्टानी ने आयरलैंड में बिखेरे हास्य-व्यंग्य के देसी पंच


भोपाल। मध्यप्रदेश लेखक संघ के अध्यक्ष वरिष्ठ साहित्यकार, हास्य व्यंग्य कवि राजेन्द्र गट्टानी ने गत 18 जुलाई को आयरलैंड की राजधानी में आयोजित लाफ्टर इवनिंग में मुख्य भूमिका निभाते हुए अपनी प्रस्तुति दी ।

"देसी पंच-विदेसी मंच" की थीम पर हुए दो घण्टे के इस कार्यक्रम में अपनी प्रस्तुति में सौ से अधिक प्रवासी भारतीय श्रोताओं को एक घण्टे से अधिक समय तक गुदगुदाते हुए सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार करते हुए भारतीय संस्कारों की जीवंतता बनाए रखने हेतु उनकी सराहना भी की ।

प्रवासी भारतीयों से बातचीत करती उनकी कविता के अंश देखिये--

आपके बारे में,
भारत में लोगों के अलग-अलग ख्याल हैं,
कुछ खुश होते हैं,
तो कुछ के मन में मलाल है.
मलाल, इस बात का,
कि घर -बार छोड़कर परदेस में बैठा है
जबकि माँ-बाप का इकलौता बेटा है।

हाँ, यह भी एक सोच है,
मगर, इसमें निगेटिव एप्रोच है।
क्योंकि, स्वदेश में रह रही संतानें
संस्कारित और कर्तव्यनिष्ठ ही होंगी
यह भी हमारे भ्रम हैं
और इसका प्रमाण,
लगातार बढ़ रहे वृद्धाश्रम हैं।

अब आता हूँ दूसरी बात पर
यानी भारत वासियों के पॉजिटिव जज़्बात पर
माना कि आपने, मातृभूमि को छोड़ा है
मगर, मैं देख रहा है कि
संस्कारों से नाता नहीं तोड़ा है।

जब आप लोगों का, भारतीय पर्वों को
उत्साह पूर्वक मनाता हुआ
वीडिओ सामने आता है
तो वसुधैव कुटुम्बकम की संस्कृति का 
उदाहरण बन जाता है। 

और
जब बेटे की मित्र मण्डली करती है चरण स्पर्श,
तो, साफ दिखता है संस्कारों का उत्कर्ष।।


एक घण्टे से अधिक समय की प्रस्तुति में श्री गट्टानी ने हास्य-व्यंग्य के कई रंग बिखेरे । आज की स्वार्थवादी मानसिकता पर कटाक्ष करते हुए उनके यह पंच कुछ इस तरह थे--

मुक़ाबिल आपके कैसे टिकूँगा
मुझे चालाकियां आती कहाँ है ?
*
मुझसे बिगाड़ मत
मैं बहुत काम आऊँगा
दुकान, मुखौटों की
अभी खोल रहा हूँ ।।
*
मुझसे
दूरी बना चुके हैं जो
उनकी बस
एक ही शिक़ायत है
चलन से
हो चुकी बाहर फिर भी
मेरे अंदर ये शराफ़त क्यों है ।
*
ज़रूरत पर यक़ीनन
हम तुम्हें भी याद कर लेंगे
अभी जिनकी ज़रूरत है
उन्हें तो यूज़/थ्रू कर लें
*
उन्होंने नेक नीयत, साफ़ दिल
क़ाबिल कहा मुझको
मगर, फिर कह दिया
मेरे तो मतलब के नहीं हो
*
उसने
गर्मजोशी से हाथ मिलाया
और
मेरी आस्तीन को घूरने लगा
शायद,
रहने की जगह तलाश रहा था.
*
आस्तीन कुर्ते की अब कुछ
ढीली सिलवाता हूँ मैं
जिनको भी रहना है
कोई फस्सम फस्सा नहीं रहे ।।

श्री गट्टानी की प्रस्तुति पर उपस्थित श्रोताओं ने उन्हें स्टैंडिंग ओविशन देकर सम्मानित किया, उल्लेखनीय है वह 2022 और 2025 में भी आयरलैंड यात्रा कर चुके हैं और दोनों ही बार भारत के राजदूत ने उनसे हुई मुलाक़त को अपने सोशल एकाउंट पर शेयर किया है, मध्यप्रदेश लेखक संघ के प्रदेशाध्यक्ष श्री गट्टानी की इस अंतरराष्ट्रीय प्रस्तुति पर अनेक साहित्यकारों ने उन्हें बधाई और शुभकामनाएं देते हुए गौरवशाली उपलब्धि बताया है ।

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