भारत में शब्दकोश की परंपरा और शब्दावली में परिवर्तन पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न
उज्जैन। सम्राट् विक्रमादित्य विश्वविद्यालय की हिंदी अध्ययनशाला द्वारा पीएम उषा योजना के अंतर्गत एमपी कॉन, भोपाल के सहयोग से छह दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। मंगलवार को वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली और विज्ञान लेखन की संभावनाएं पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न हुई, जिसके मुख्य अतिथि वरिष्ठ विज्ञान लेखक प्रो मनमोहन प्रकाश श्रीवास्तव इंदौर थे। अध्यक्षता वरिष्ठ लेखक डॉ हरेराम वाजपेयी, इंदौर ने की। सारस्वत अतिथि कुलगुरु प्रो अर्पण भारद्वाज, प्रवासी साहित्यकार श्री सुरेश चंद्र शुक्ल शरद आलोक, ओस्लो, नॉर्वे, प्रो स्नेहलता श्रीवास्तव, इंदौर, वरिष्ठ विज्ञान लेखक श्री चक्रेश जैन, इंदौर, पूर्व महाप्रबंधक, राजभाषा, मुंबई डॉ शशांक दुबे, कुलानुशासक प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा, डॉ नीलिमा वर्मा, प्रो जगदीश चंद्र शर्मा आदि ने संगोष्ठी में प्रकाश डाला। प्रारम्भ में अतिथियों को अंग वस्त्र, सूत की माला, प्रतीक चिह्न एवं साहित्य भेँट कर उनका सारस्वत सम्मान किया गया।
मुख्य अतिथि विज्ञान लेखक प्रो मनमोहन प्रकाश श्रीवास्तव, इंदौर ने अपने उद्बोधन में कहा कि विज्ञान लेखन के लिए बहुत गहन अध्ययन, अपनी मातृभाषा का ज्ञान और मूल पुस्तकों का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है। विज्ञान लेखन और संप्रेषण के लिए मानकीकरण का ध्यान रखना चाहिए। साथ ही किसी एक भाषा पर पूर्ण अधिकार के साथ उसका सटीक प्रयोग करना चाहिए।
अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. हरेराम वाजपेयी, इंदौर ने कहा कि ज्ञान से बढ़कर कुछ नहीं है। भाषा का सीधा संबंध सुनने, समझने के बाद उसे प्रयोग में लाने से है। आज हम उससे बहुत दूर होते जा रहे हैं। युवा पीढ़ी को एआई के प्रयोग से बचकर शोध और लेखन कार्य में मौलिकता लानी चाहिए। एक शब्द के कई अर्थ निकाल देना यह विज्ञान है। पढ़ते रहिए और अध्ययन करते रहिए तो विज्ञान लेखन आसानी से हो सकता है।
कुलानुशासक प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा ने कहा कि हर विषय के विकास के लिए चाहे वह विज्ञान या किसी अन्य शाखा से सम्बद्ध हो, उसके अनुकूल वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली के विकास की आवश्यकता होती है। वैज्ञानिक - तकनीकी शब्दावली वैश्वीकरण को आधार देती है। विज्ञान में हर शब्द का निश्चित, स्थिर अर्थ होता है। इसलिए सामान्य शब्दकोश की तुलना में वैज्ञानिक शब्दकोश में शब्दों के सीमित विषयगत अर्थ होते हैं। शब्द की परिभाषा ही अर्थ को पूर्णतः स्पष्ट करती है। वैज्ञानिक एवं तकनीकी ज्ञान के प्रसार के लिए वैज्ञानिक शब्दावली महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
सारस्वत अतिथि डॉ. स्नेहलता श्रीवास्तव ने अपने वक्तव्य में विज्ञान लेखन के समक्ष चुनौतियों पर चर्चा करते हुए कहा कि मानसिकता, भाषा और शब्दावली, व्यापकता और गुणवत्ता विज्ञान लेखन की सबसे बड़ी चुनौतियां हैं। हमें इसे सुधारने और इन कमियों को दूर कर अच्छे विज्ञान लेखन की दिशा में कार्य करना चाहिए।
वरिष्ठ विज्ञान संचारक डॉ चक्रेश जैन इंदौर ने अपने उद्बोधन में कहा कि विज्ञान जनसंचार का क्षेत्र व्यापक है। हिंदी अत्यंत सशक्त भाषा है जिसके माध्यम से हम विचारों का आदान-प्रदान, संचार और जानकारी साझा कर सकते हैं। हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण को रेडियो, टीवी इत्यादि के माध्यम से लोगों तक पहुंचा सकते हैं। अपनी मातृभाषा में सोचना और फिर लेखन कार्य करना चाहिए। विज्ञान लेखन को विभिन्न विधाओं के माध्यम से सशक्त ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता है।
सारस्वत अतिथि डॉ शशांक दुबे ने शासकीय प्रयोजनों और बैंकों की शब्दावली में आम बोलचाल की भाषा के प्रयोग पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि शब्दों का संक्षिप्तीकरण और परिवर्तन तेजी से हो रहा है इसे हमें रोकना चाहिए। युवा पीढ़ी को अपनी भाषा को समृद्ध बनाना चाहिए। डॉ शिव चौरसिया ने शब्द की महिमा पर बात करते हुए बताया कि शब्द की ताकत बहुत होती है। शब्द की साधना करनी चाहिए अवहेलना नहीं।
भाषा की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए साहित्यकार श्री सुरेश चंद्र 'शरद' आलोक, ओस्लो नॉर्वे और प्रसिद्ध कवि श्री अशोक भाटी ने कविता पाठ किया। तकनीकी सत्र की अध्यक्षता श्री सुरेश चंद्र शुक्ल ने की। श्री हरेराम वाजपेयी इंदौर, डॉ नेत्रा रावणकर, प्रो हरिमोहन बुधौलिया, श्री मुकेश जोशी, डॉ बी के शर्मा आदि ने सत्र में विचार व्यक्त किए। सुंदरलाल मालवीय और नारायणी माया बधेका ने लोक गीतों की प्रस्तुति की।कार्यक्रम का संचालन शोधार्थी पूजा परमार और अजय सूर्यवंशी ने किया और आभार प्रदर्शन प्रो. जगदीशचंद्र शर्मा ने किया।



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