Subscribe Us

श्रमिक (कविता) -प्रतिभा पाण्डेय 'प्रति'


माँ के आँचल की छाँव छोड़ी ।
अपना बचपना भाव छोड़ा ।
कच्ची पक्की पगडंडियाँ,
घुमावदार गलीयाँ और
प्यारा गांव छोड़ा ।
लंगोटिया यार ,
पिता जी घर-बार छोड़ा।
बोझ अपनों का ,
त्याग सपनों का ,
दुर्दिनता का शिकार हूँ ,
पर
अपनों का सपना साकार करता हूँ ।
पैर बिवाई फट रही मेरी ,
फिर भी कडी मेहनत करता हूँ।
सूखी रोटी खाता हूँ ,
पर पकवान खिलाता हूँ ।
बेशक हँसता कम हूँ ,
पर सबको हँसाता हूँ ।
परिवार से बहुत दूर हूँ ,
क्योंकि मैं मजबूर हूँ ।
घबराता नहीं मैं तनिक ,
भार उठाता हूँ अधिक ।
तिनका-तिनका जोड़ता ,
सीना तान गर्व से ,
कहलाता हूँ श्रमिक।

-प्रतिभा पाण्डेय 'प्रति' चैन्नई

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ