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अस्मिता (कविता) -डॉ रेखा यादव 'निर्झर'


सब से बड़ा प्रहार
क़्या बच्चे क्या नौजवान
छोड़ते कहॉ वृद्धा को
औरत के जीवन का
सबसे बड़ा अपमान
चीखती, चिल्लाती
वापिस ला न पाती हैं
क्यों,औरत अपना सम्मान ।

जिस्म के भूखों को
मिलती नहीं सजा
लुटते हैं अस्मिता को
जल्लाद घूमते हैं सारेआम
कर के सीना छल्नी-छल्नी
नारी का जीवन तार तार

वहशी दरिंदे नेत्र वाले
ढके लिबास में भी ढूंढते हैं
हवस का शिकार।
नोच-नोच कर घायल कर
खुद को माने भगवान

समाज की इन जंजीरो को तोड़ो तुम
क्यों गुमसुम हों
चुप रहना छोड़ो तुम
हुआ बलात्कार तेरा
क्या इसमे दोष तुम्हारा
शर्म से मुंह ढको ना तुम
अपनी स्वाभिमान क़े लिए
ख़ुद लक्ष्मी बाई बनो तुम

क्यों समझती हो इज्जत गई तुम्हारी
दोषी तो हैं वो
शरीर को जिसने इज्जत बनाई
तुम आज भी वही हो
कल भीं वही रहोगी
बस अपनी ताकत क़ो पहचानों
न बनो लाचार
फिर नहीं होगा अत्यचार

-डॉ रेखा यादव 'निर्झर',ललितपुर (बिराटनगर)नेपाल


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