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स्त्री (कविता)


स्त्री
बेशक कोमल है
लेकिन
कमजोर नहीं है
जीवन का संगीत है
अनर्गल शोर नहीं है

अनगिनत रिश्तों की डोर में
बँध जाती सहज ही
और
बाँध लेती सबको
उस जैसा
कोई और नहीं है

प्यार के बदले में प्यार ही देती है
प्यार से बोलो
तो सब दुख सह लेती है
वह ममता की मूरत है
प्रेम की सूरत है
धुरी है परिवार की
संसार की जरूरत है

वो देवी है
वरदायिनी और कल्याणी है
अगर छेड़ दे कोई नासमझ
तो फिर
भरवाती उससे पानी है

धैर्य, साहस,त्याग,समर्पण की पर्याय है
इनके सहज उदाहरण
अहिल्या बाई,लक्ष्मी बाई,मीरा बाई
और पन्ना धाय है

इस पर भी कोई
चोटिल करे उसकी आत्मा
तो
सिंघनी सी दहाड़ती है
दहलाकर
दुश्मन की छाती को फाड़ती है

स्त्री
प्यार है,अभिसार है,
खूबसूरत संसार है
लेकिन
काँच की किरचों सी बिखर जाती है वह
जब मिलती दुत्कार है
यही किरचें
जब चुभतीं हैं दुश्मन को
तो कहने लगते हैं
स्त्री अबूझ पहेली है
दोधारी तलवार है
बहुत बेकार है

-निरंजना जैन, सागर


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