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शहर चले आए (गीत)


गांव छोड़कर हम -
शहर तो चले आए ।
मिला न कोई अपना -
लगें सब पराए ।

गांव में पराए भी -
लगते थे अपने ।
होते थे रतजगे -
न टूटते थे सपने ।

पेट की फ़िक्र में -
न ढंग से सो पाए ।

कहीं भी मिला नहीं -
दिल को सुकून ज़रा ।
शाम तक ये आदमी -
दिखे यहां अधमरा ।

ज़ालिम बनकर शहर -
ज़ुल्म हम पर ढाए ।

घर , आंगन , देहरी -
बिरवे लापता दिखें ।
पनघट , पनिहारिण -
न पगडंडी यहां मिले ।

चौपालों को अब तक -
हम भूल न पाए ।

काग़ज़ के फूलों से -
शहर है गुलज़ार ।
आदमी का सजा है -
सुबह से बाज़ार ।

नेकी हम बेच रहे -
गांव से जो लाए ।

दिन भर घूमते -
सांसों का बोझ उठाए ।
पांवों के छाले -
रिस - रिस हमें सताएं ।

हाथों के फफोले -
हमें रोज़ रुलाएं ।

-अशोक 'आनन', मक्सी (शाजापुर)


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