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हिंदी विकास में जैन साहित्यकारों का बड़ा योगदान : डॉ. दिलीप धींग



चेन्नई।शसुन जैन काॅलेज में जैनविद्या विभाग के शोध-प्रमुख साहित्यकार डाॅ. दिलीप धींग ने कहा कि हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति की उन्नति में जैन साहित्य और साहित्यकारों का ऐतिहासिक योगदान है। लेकिन जैनों के योगदान का यथेष्ट मूल्यांकन नहीं हुआ। श्री स्थानकवासी जैन स्वाध्याय संघ, तमिलनाडु के तत्वावधान में यहां केएलपी अभिनंदन अपार्टमेंट में आयोजित व्याख्यानमाला में 14 सितम्बर को उन्होंने कहा कि हिंदी को सिर्फ संस्कृत से विकसित कहना अर्धसत्य है। वस्तुतः हिंदी प्राकृत और संस्कृत दोनों की बेटी है। हिंदी प्राकृत की अधिक ऋणी है। विभिन्न प्राकृत भाषाओं से ही हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं का विकास हुआ है। जैन साहित्यकारों ने प्राकृत की अनेक प्रवृत्तियों को हिंदी में समायोजित किया। प्राकृत ने ही हिंदी को सरल और लोकग्राह्य बनाया है।
डाॅ. धींग ने कहा कि हिंदी सिर्फ साहित्य की भाषा ही नहीं, अपितु ज्ञान, विज्ञान, अध्यात्म और लोकजीवन की भाषा भी है। जैन साहित्य का प्राकृत से बुनियादी रिश्ता होने से हिंदी से आदिकालीन अभिन्न सम्बन्ध है। हिंदी की पहली आत्मकथा जैन कवि बनारसीदास ने लिखी। डाॅ. कस्तूरचंद कासलीवाल ने हिंदी जैन साहित्य को बीस खंडों में प्रकाशित करवाया। महापंडित राहुल सांकृतायन ने लिखा था कि प्राचीन जैन ग्रंथ भंडारों में केवल जैन साहित्य को ही संरक्षण नहीं मिला, अपितु समग्र भारतीय साहित्य को संरक्षण मिला। अनिता मकाणा ने प्राकृत ग्रंथ अंतगडदसा का वाचन हिंदी अनुवाद के साथ किया। प्रणत धींग ने डाॅ. धींग की हिंदी कविता सुनाकर शाबाशी पाई। आरंभ में श्राविकाओं ने हिंदी गीत के जरिये सिद्ध भगवान की सामूहिक स्तुति की। अंत में प्रसन्न बागमार ने आभार जताया।

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