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एक बाजार ऐसा भी


जयति जैन 'नूतन'

काश
होता कोई बाजार ऐसा भी
जहाँ बिक जाते सभी गम
खरीद लेते थोड़ी- सी खुशियां
बांट देते थोड़ा थोड़ा खुद को भी हम।
किसी के संग हँस लेते
किसी के संग रो लेते
कोई समझ से परे होता तो
उसको भी खुद से लपेट लेते।
घूमते बेफिक्र होकर
जैसे खुद का ही तो घर है
नाचते मगन होकर
जैसे बज रही कोई मृदंग है
वजूद की तलाश जहां नहीं होती
बस रोशन दिया बन चमकते हम।
बिस्तर पर थककर गिरना न होता फिर
तंग गलियों से गुजरना न होता फिर
यूं ही पार हो जाती सभी मुश्किलें
गिरकर भी संभल जाते फिर हम।
आओ
तलाश करें ऐसे बाजार को
जहां हमारा तुम्हारा कोई मोल न लगा पाए
जहाँ हम साथ हों और कोई शोर न मचा पाए
हंसते -मुस्कुराते सब एक दूसरे से प्यार करें
होकर जुदा भी कोई जुदा न हो पाए
काश
होता कोई बाजार ऐसा भी
जहां जिंदगी बस जिंदगी रहती
न कोई बेचैनी संग होती।

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