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किसान आंदोलन : संघ प्रमुख मोहन भागवत क्यों है मौन ?

डॉ चन्दर सोनाने
वर्ष 2021 के पहले माह जनवरी के अंतिम रविवार को एक बार फिर देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी अपनी मन की बात में दो माह से अधिक समय से चल रहे किसान आंदोलन , उनकी समस्याओं और उनकी वाजिब मांगों के बारे में कुछ भी नहीं बोले। वे बोले भी तो 26 जनवरी की हिंसा पर , किन्तु किसानों के 66 दिन से कंपकंपाती ठंड में धरने देने के कारणों पर वे मौन रहे ! एक माह पहले वर्ष 2020 के अंतिम माह दिसंबर के अंतिम रविवार को भी मोदी जी किसान आंदोलन के बारे में कुछ नहीं बोले थे । तब आंदोलन को एक माह से ऊपर हो गया था । यानी देश के अन्नदाता किसानों के 66 दिन से चल रहे आंदोलन का उनकी नजर में कोई महत्व ही नहीं है , कि जिस पर वे कुछ बोलें ! उन्होंने लगातार दो माह मन की बात में देश भर की बातें की , किन्तु उन्होंने किसानों के धरने , उनकी समस्याओं , उनकी मांगों और किसानों को उनकी उपज की वाजिब कीमत कैसे उन्हें मिलें ? इस पर कोई बात नहीं की ! इसे क्या कहेंगे ?

ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने अपने पहले प्रधानमंत्री के कार्यकाल के नोटबन्दी जैसे असफल प्रयोग से सीख नहीं ली है , जिसने देश भर के उद्योग , धंधे , व्यापार , व्यवसाय की रीढ़ तोड़ कर रख दी थी । और लाखों व्यक्तियों को बेरोजगार हो जाना पड़ा था । आज यदि किसानों की सही समस्याओं को नहीं सुना गया तो कौन किसान आगे खेती करना पसंद करेगा ? और कौन किसान अपनी औलादों को आगे भी किसान बनने के लिए कहेगा ? देश की आजादी के बाद किसानों की संख्या के आंकड़ें स्पष्ट रूप से ये बात कह रहे हैं कि हर वर्ष किसानों की संख्या कम और कम होती जा रही है ! यदि इसी प्रकार किसानों की बात नहीं सुनी गई तो भविष्य में कौन खेती - किसानी करना पसंद करेगा ?


शायद श्री नरेन्द्र मोदी जी में , दूसरी बार भी प्रधानमंत्री का दायित्व मिलने से , अभिमान आ गया है ! इतिहास गवाह है कि देश में आजादी के पहले के किसान आंदोलन हों या बाद के किसान आंदोलन , वे देश में बदलाव की बड़ी वजह बने हैं । इन आंदोलनों के विस्तार में नहीं जाते हुए हम उदाहरण के लिए केवल एक ही किसान आंदोलन के बारे में बात करें तो याद आता है वर्ष 1988 का किसान आंदोलन ! उस समय अचानक धूमकेतु की तरह उभरे किसान नेता श्री महेंद्र सिंह टिकैत ने करीब 5 लाख किसानों के साथ एक सप्ताह तक दिल्ली के बोट क्लब पर अपने हजारों ट्रैक्टर और बैलगाड़ियों के साथ धरना दिया था । इसी कारण उस समय के प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी को किसानों के 35 सूत्रीय चार्टर को मानना पड़ा था । उन्हीं महेंद्र सिंह टिकैत के सुपुत्र हैं , वर्तमान के किसान आंदोलन के नेता श्री राकेश टिकैत और उनके बड़े भाई श्री नरेश टिकैत । उस समय प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी की दूरदर्शिता ही थी कि उन्होंने किसानों को दो माह से ज्यादा समय तक अपनी बात मनवाने के लिए तरसाया नहीं था और देश के अन्नदाता की वाजिब मांगें मान ली थी । क्या प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी आज वह नहीं करना कहते हैं , जो उस समय राजीव गांधी ने किया था ? या कुछ और बात है ?


वर्ष 1988 का किसान आंदोलन हो या इस समय का किसान आंदोलन या इसके आगे - पीछे के किसान आंदोलन । सब में एक बड़ी बात समान थी । वह थी , किसानों को उनकी उपज का वाजिब दाम उन्हें मिलें । है ना आश्चर्य की बात ! आज भी किसान अपनी इसी सबसे बड़ी माँग के लिए लगातार कई दशकों से जुझ रहे हैं ! यह कितना दुखद है कि किसानों को देश की आजादी के बाद से आज तक ऐसा प्रधानमंत्री नहीं मिला जो उनकी वाजिब और मूलभूत समस्या को समझ कर उसका स्थायी निराकरण कर सकें !


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का इतिहास रहा है कि जब भी उनकी पार्टी भाजपा के प्रधान मंत्री रहे हों या किसी राज्य के मुख्यमंत्री , जब भी वे उनकी लाइन से हट कर चले तो तुरंत संघ ने अपनी लगाम कसी है और उन्हें अपनी राह ले आये हैं । किंतु इस बार जब देश का किसान घर बार छोड़कर कड़कड़ाती ठंड में खुले आसमान के नीचे अपनी समस्याओं और मांगों के लिए दो महीने से अधिक समय से बैठा हो , और देश का उनकी पार्टी का प्रधानमंत्री कुछ नहीं कह रहा हो , कुछ नहीं कर रहा हो तथा वह मौन हो तो फिर संघ प्रमुख श्री मोहन भागवत जी कैसे मौन है ? क्यों मौन है ? क्या कारण है कि वे मौन है ?


श्री मोहन भागवत जी के मौन के कई अर्थ निकलते हैं ! एक तो यह कि उनकी भी इस बात में सहमति है कि किसान धरने पर बैठें हैं , तो बैठें रहें ! जैसी की प्रधानमंत्री जी की अभी तक की नीति रही है । यदि ऐसा है तो फिर कुछ भी नहीं कहना है ! किंतु यदि ऐसा नहीं है तो फिर वे अभी तक क्यों मौन है ? यह प्रश्न फिर खड़ा है । क्या प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी उनकी नहीं सुन रहे हैं ? क्या मोदी जी इतने बड़े हो गए हैं कि अपने संघ प्रमुख श्री मोहन भागवत जी की भी नहीं सुन रहे हैं ? संघ का और भाजपा का हमेशा से ही यह मानना रहा है कि व्यक्ति महत्वपूर्ण नहीं है , संगठन महत्वपूर्ण है । किन्तु यहाँ तो संगठन कठपुतली है । जैसे कि प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी के समय कांग्रेस के संगठन की हालत थी , आज वही भाजपा के संगठन की भी हालत है । यह एक ऐसा राज है , जो सबको पता है । किंतु हम बात कर रहे हैं आदर्श , सूचिता , सब से हट कर पार्टी की ! आपको हँसी आ रही है ? हँस लीजिये भाई ! तो बात हो रही थी भाजपा की । अभी तक तो भाजपा का कोई भी कितना भी बड़ा क्यों नहीं हो , वे सब संघ प्रमुख की बात मानने , सुनने और उसका पालन करने के लिए प्रतिबद्ध रहे हैं । ये तो आप भी मानेंगे ही । इससे कोई भी इंकार नहीं कर सकता ।


तो फिर वही यक्ष प्रश्न ! संघ प्रमुख श्री मोहन भागवत जी अभी भी कुछ बोल क्यों नहीं रहे हैं ? वे इस ज्वलंत मुद्दे पर क्यों है मौन ? मुझे तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है। आपको कुछ समझ में आये तो कृपया मुझे भी बताइयेगा ! बताएंगे ना ?
(लेखक मध्यप्रदेश के पूर्व जनसंपर्क अधिकारी है)

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