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बसंती प्यार की खुशबू

डॉ.रघुनाथ मिश्र 'सहज'

गगन तक महकती है अब, बसंती प्यार की खुशबू.

मगन मन है सुखद अहसास, प्रियतम -यार की खुशबू.

वतन पर हो फ़िदा देता, सख्श उदगार से राहत,
जतन कर भर जहाँ में तू, सुहानी ब्यार की खुशबू.

जहाँ भी देखते हैं हम, फ़जाओं में भरा जज़्बा,
चहकता है मयूरा जब, मिले अवतार की खुशबू.

हरिक दिल को लगे ज्यूँ है, बसंती धूप इक औषधि,
हरी हर पीर दिल की ये, बसंती धार की खुशबू.

'सहज' पीड़ा डरेगी मन, चलन को रख सदा ही खुश,
सरल औ तरल हो जीवन, मिले श्रम सार की खुशबू.

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