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हर बार

राजीव डोगरा 'विमल'

सोचकर तुमको
लिखता हूँ अपने जज्बात,
न चाहते हुए भी
टूट कर चाहता हूँ
तुमको हर बार।
सोच में मेरी
तुम हर पल ही रहे
मेरे पास।
पर जीवन पंथ में,
सुनकर औरों के बोल
हटते रहे तुम
मुझसे हर बार।
गला घोट कर भी
अपनी ख्वाहिशों का,
करता रहा तुमसे
मोहब्बत दिन और रात।
पर देखकर तुम
औरों की हंसी
दिल दुखाते रहे
मेरा हर बार।

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