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खोखली हंसी

सुरेश शर्मा
अक्सर लोगों को हमने देखा है !
हंसते हुए ,
मुस्कुराते हुए ,
खुश होते हुए ,
प्रफुल्लित होते हुए ;
खोखली हंसी हंसते हुए ।

आज !
शहर-शहर, नगर -नगर ,
मानव रिश्तों में पड़ती दरारों
की कड़वाहट ।
बुझी हुई दिल की अनचाही
मुस्कुराहट ।
खोखली हंसी का सबूत देती है ।

बड़ी बड़ी गगनचुंबी ईमारतों की ,
सुख चैन से वंचित जिन्दगी ;
व्यथित जिन्दगी जीने को
मजबूर करती है ।
वहाँ भी !
खोखली हंसी का हीं सबूत देती है ।

अपनो के साथ रहकर भी ,
अंजानों की तरह रहने पर ;
शकुन को तलाशने की
तरकीब ढूंढती है ।
वहाँ भी !
खोखली हंसी का सबूत देती है ।

तन्हाईयों में कटती जिन्दगी ,
अपनों को ढूंढने में परेशान रहती है ।
परायों के साथ रहकर भी ,
अपनों की तलाश खटकती है ।
हर जगह !
खोखली हंसी का हीं सबूत देती है ।

आज !
अपने ! अपने हीं नही रहें !
दुनिया वीरान - सी लगने लगी है ।
वक्त की कठोर पगडंडियों पर चलकर ,
अपनों की एहसास भी अंजान सी लगती है ।
आज हर एक एहसास ;
खोखली हंसी का सबूत देती है ।

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