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जाने वाले साल


अजय कुमार द्विवेदी 'अजय'
धन्यवाद देता हूँ तुझको जाने वाले साल।
एक वर्ष में दिखलायें है तुने कई कमाल।
किसी के मूंह से रोटी छिनी किसी से छिना प्राण।
उथल-पुथल करके रख्खा और मचा दिया धमाल।

गोदे सुनी हो गई माँ की बाप के कन्धे टूटे।
ना जाने कितने ही घर सोये रातों में भूखे।
कैद हुए हम कई महीने अपने घर के भीतर।
बीबी बच्चों संघ बैठे हम अक्सर रूठे-रूठे।

बिलख-बिलख कर रोयें बच्चे मांये अश्रु बहायें।
पिता की चिंता सोचे दिनभर कैसे समय बितायें।
पैसे नहीं है इक भी घर में खाने को न दाना है।
नौकरी भी तो छूट गई अब रोटी कहाँ से लायें।

बहनें विधवा हुईं कई और बच्चे कई अनाथ हुए।
कोरोना के चलतें जाने कितने घर बर्बाद हुए।
आने वाला है इक्कीस उम्मीद हृदय में जागी है।
ऐसा हुआ प्रतित की मानों कैद से हम आजाद हुए।

फिर भी तुझको दोष न दूंगा तुने ज्ञान सिखाया है।
बड़ी-बड़ी मुश्किल से कैसे बचना हमें बताया है।
कोरोना से लड़ते-लड़ते जीना हम सब सीख गये।
तुने ही हर मुश्किल से लड़ना हमें सिखाया है।

नववर्ष में कोरोना का प्रभु हो जाये समाधान।
हर कोई बढ़ चढ़ कर पाये इस दुनियां में मान।
कोई भी भूखा न सोये ये दुनियां हो खुशहाल।
हाथ जोड़कर विनय यही है ईश्वर दो वरदान।

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