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फज़ा हर तरफ जब है इक़रार की



हमीद कानपुरी
फज़ा हर तरफ जब है इक़रार की।
नहीं कीजिए बात इंकार की।

नई रोशनी उस को आयी नज़र,
नज़र जिस घड़ी उसने बेदार की।

तड़पता हुआ दिल सुकूं पा गया,
हुई जब से आमद मेरे यार‌ की।

सिवा उसके कुछ और भाता नहीं,
लगी हो जिसे भी लगन प्यार की।

उसे किस तरह फिर मनाएं भला,
अगर बात सुनता नहीं प्यार की।

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