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उसकी याद दिसम्बर में

रमाकान्त चौधरी

माना दिल को बहुत सताए उसकी याद दिसम्बर में |

गर्म रजाई सी  लगती  पर उसकी याद दिसम्बर में |

 

सर्द हवाएं , कोहरा , पाला  अपना  रंग जमाते जब,

कडक चाय सी लगती  तब उसकी याद दिसम्बर में |

 

जब सबसे आँख मिलाती घूमे सर्दी चंचल बाला सी,

मई जून सी लगती  तब  उसकी याद दिसम्बर में |

 

महबूब गले से लिपट लिपट  बोसे पर बोसा देता हो,  

अरमान हों पूरे सब जिसके वह आबाद दिसम्बर में |

 

जिनका ओढ़न आसमान है और बिछावन  धरती है,

ठिठुरन की चादर में लिपटा वह बर्बाद दिसम्बर में |

 

थर-थर कांपे तन  उसका  बोल न मुंह से फूट रहा,  

बूढी माँ की कौन सुने  अब  फरियाद दिसम्बर में |

 

बतकही करें संग ताप-ताप,चुन्नू के कोइरे परअहमद,  

दर्द भी पूछे एक दूजे का कहाँ वो बात दिसम्बर में|


*कोइरा  = अलाव

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