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भारतीय सभ्यता और संस्कृति में साम्प्रदायिक सद्भाव की अनोखी व अनूठी मिसाल 

✍️सुनील कुमार माथुर
हमारा देश कश्मीर से कन्या कुमारी तक एक है और यहां विभिन्न जाति, सम्प्रदाय, भाषा व क्षेत्र के लोग रहते हैं फिर भी यहां साम्प्रदायिक सद् भाव की अनोखी व अनूठी मिसाल देखने को मिलती हैं चूंकि यहां विभिन्न जाति के लोग भले ही रहते हो लेकिन वे एक - दूसरे के तीज त्यौहार में सरीक होकर उनके तीज-त्यौहार में चार चांद लगा देते हैं । हमारे देश मे यह कोई आज की नई बात नहीं है अपितु हमारी कई पीढियों से यह परम्परा चली आ रही है । यहीं वजह है कि आज देश भर में हमें कौमी एकता की मिसाल देखने को मिलती है ।
 
 हमारे धर्म व जाति भले ही अलग-अलग हो लेकिन सभी धर्मों की मूल शिक्षा एक ही हैं और वह हैं सबसे प्रेम करों, दीन दुखियों की निस्वार्थ भाव से  सेवा करें । अपने माता - पिता एवं अपने से बडों का मान - सम्मान करें । बच्चों से प्यार करें । भूखें को भोजन करायें एवं प्यासे को पानी पिलायें । सदा सत्य बोलें । जिस घर - परिवार में नारी का सम्मान होता हैं वहां देवी -देवताओं व लक्ष्मी का वास होता हैं 
 
अगर आप अपने माता- पिता की सेवा करते हैं, उनका मान सम्मान करते हैं तो फिर आपकों मंदिर  , मजिस्द , गुरूद्वारा जाने की जरूरत नहीं है चूंकि आपके माता - पिता, बडे बुजुर्गों की सेवा ही ईश्वर की सबसे बडी सेवा हैं । हमारे देवी - देवता तो अपने भक्तों के प्रेम के भूखे है । लेकिन हम यह सब जानते हुए भी धर्म  , जाति , भाषा व क्षेत्र के नाम पर झगड़ा करते हैं । खून खराबा व हिंसा करते हैं । व्यक्ति किसी भी जाति , धर्म, भाषा व क्षेत्र का क्यों न हो लेकिन सभी के खून का रंग लाल ही हैं । 
 
 हमारे सभी जाति के धर्म ग्रंथ एवं गुरू एक ही शिक्षा देते हैं और कहते हैं कि सभी से प्यार करें । सभी के साथ भाईचारे कि भावना के साथ मिलजुल कर रहें । हर समस्या का समाधान आपस में विचार विमर्श करके करें । लेकिन हम अपने स्वार्थ में इतने अंधे हो गये हैं कि आज धर्म, जाति , भाषा व क्षेत्र के नाम पर लड रहें है । हमारे धर्म की शिक्षा एक ही संदेश देती हैं वह हैं प्रेम व भाईचारे की ।
 
 हमारे पूजा पाठ का तरीका भले ही भिन्न  - भिन्न है लेकिन सभी धर्म एक ही शिक्षा देते है । कोई भी धर्म नफरत करना नहीं सिखाता है यही हमारे हिन्दुस्तान की विशेषता है । हर धर्म  , जाति , भाषा व क्षेत्र का सम्मान करना चाहिए । कोई भी धर्म व जाति छोटी -बडी नहीं है । हर लोग अपना - अपना कर्म करें और इंसानियत को बनायें रखें । 
 
 आज छोटी से छोटी बात को लेकर पिता - पुत्र, भाई - भाई एक - दूसरे के खून के प्यासे हैं । कोई भी धर्म, जाति हमें हिंसा, नफरत , घृणा, क्रोध, लडाई झगड़े, चापलूसी जैसी बातें नहीं सिखाता है । यह सब बुराईयां हमनें अपने स्वार्थ की खातिर पैदा की हैं । हम अपने स्वार्थ में इतने अंधे हो गये हैं कि उसकी आड में सभी अच्छाइयों को ताक पर रख देते हैं । 
 
आप अगर किसी का भला न कर सको तो कोई बात नहीं लेकिन किसी का बुरा तो मत करों  । अगर आप किसी भूखें को भोजन न करा सको तो कोई बात नहीं लेकिन उसकी गरीबी का मजाक तो मत उडाओ । आपने दान - पुण्य किया हैं तो बहुत अच्छी बात हैं लेकिन इसका प्रचार-प्रसार तो मत करों । परमात्मा ने हमें यह मानव जीवन दिया है तो दूसरों की सेवा करने के लिए ही तो दिया हैं तब फिर हम साम्प्रदायिक सद् भाव व सौहार्द को क्यों बिगाडे ।
 
 हमें हमेशा त्याग- तपस्या, परोपकार, निस्वार्थ सेवाभाव में जुटा रहना चाहिए । हमें इन दिव्य गुणों को जीवन में अंगीकार करना चाहिए । हमारा आत्म बल मजबूत होना चाहिए व दृढ इच्छा शक्ति भी होनी चाहिए । धन , लोभ , लालच , आकांक्षा व अंहकार एवं पद प्रतिष्ठा के चक्कर में न पडकर अपना समूचा जीवन सादगी के साथ बिता देना चाहिए । सकारात्मक सोच रखिए व सभी के साथ मधुर व्यवहार बनाये रखें । सभी धर्मों का सम्मान करना ही सच्ची मानवता हैं अन्यथा  जीवन हम क्या पशु-पक्षी भी जीते हैं जब उनमें प्रेम, स्नेह, वात्सल्य भाव व आपसी सौहार्द देखने को मिलता हैं तो फिर हम इंसानों में क्यों नहीं । हम तो पढें- लिखें इंसान है । 
 
इंसान वहीं महान कहलाता है जो दूसरों के लिए जीना चाहता हैं । अपना जीवन अपने लिए तो हर कोई जीता है जो दूसरों के लिए निस्वार्थ भाव से सेवा करें उसमें आनंद ही  कुछ और हैं । किसी महापुरुष ने सही कहा हैं कि झूठे व्यक्ति ध्दारा जोर से बोला गया झूठ सच्चे व्यक्ति को चुप करा सकता हैं लेकिन सच्चे व्यक्ति का मौन झूठे व्यक्ति की जडे हिला सकता हैं ।
 

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