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सूत्रधार साहित्यिक संस्था की छठी ऑनलाइन काव्य गोष्ठी


हैदराबाद। सूत्रधार साहित्यिक संस्था और विश्व भाषा अकादमी भारत की तेलंगाना इकाई के संयुक्त तत्वावधान में गत शनिवार को एक काव्य गोष्ठी का ऑनलाइन आयोजन किया गया। आज यहां पर जारी प्रेस विज्ञप्ति में संस्था की संस्थापिका सरिता सुराणा ने बताया कि इस काव्य गोष्ठी में हैदराबाद के साथ-साथ बाहर के कवि-कवयित्रियां भी शामिल हुए। एमएसएमई सुपरिटेंडेंट और वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप देवीशरण भट्ट ने इस गोष्ठी की अध्यक्षता की और आगरा की ख्याति प्राप्त कवयित्री एवं निवर्तमान सहायक निदेशक राजभाषा डॉ. मधु भारद्वाज ने मुख्य अतिथि के रूप में भाग लिया। श्रीमती बबीता अग्रवाल कंवल, सिलीगुड़ी विशेष अतिथि के रूप में सम्मिलित हुईं। 

हैदराबाद की वरिष्ठ कवयित्री श्रीमती ज्योति नारायण की सरस्वती वंदना से कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। तत्पश्चात् आयोजक ने सभी अतिथियों का स्वागत किया और संस्था के उद्देश्यों के बारे में जानकारी दी। इस बार की काव्य गोष्ठी दो सत्र में आयोजित की गई। प्रथम सत्र में महाकवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला के व्यक्तित्व एवं कर्त्तृत्व पर प्रस्तुत अपने आलेख में सरिता सुराणा ने विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने निराला की काव्य यात्रा के पांच चरणों के बारे में और उनकी प्रसिद्ध कृतियों के बारे में समीक्षात्मक टिप्पणी प्रस्तुत करते हुए कहा कि निराला विद्रोह और क्रान्ति के कवि थे। उन्होंने भाव, भाषा, शिल्प और छन्द आदि सभी दिशाओं में नवीनता का प्रवर्तन किया। उन्होंने समकालीन कवियों से अलग अपनी कविता में कल्पना का सहारा बहुत कम लिया और यथार्थता को प्रमुख रूप से चित्रित किया। उनका मानना था, 'मनुष्यों की मुक्ति की तरह कविता की भी मुक्ति होती है। मनुष्यों की मुक्ति कर्म के बन्धन से छुटकारा पाना है और कविता की मुक्ति छन्दों के शासन से अलग हो जाना है।' उनकी प्रसिद्ध काव्य कृतियां हैं- अनामिका, परिमल, राम की शक्तिपूजा और सरोज स्मृति आदि। इसी तरह जूही की कली, कुकुरमुत्ता, नए पत्ते, बेला, वह तोड़ती पत्थर आदि उनकी प्रसिद्ध कविताएं हैं। उन्होंने अप्सरा, अलका, निरुपमा, प्रभावती, कुल्लीभाट, बिल्लेसुर बकरिहा जैसे उपन्यास भी लिखे। वे छायावाद के चार प्रमुख आधार-स्तम्भों में से एक प्रमुख स्तम्भ थे।

कोलकाता से गोष्ठी में जुड़े वरिष्ठ साहित्यकार सुरेश चौधरी ने कहा कि निराला ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद फैली महामारी में अपने कई प्रियजनों को खो दिया। उसके बाद पूरे परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। उनके अपने निजी पुस्तकालय में निराला की कई प्राचीन कृतियां सुरक्षित हैं और वे हर वर्ष उनकी स्मृति में एक काव्य गोष्ठी का आयोजन करते हैं। ज्योति नारायण ने भी उनके जन्मदिन के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान की। 

द्वितीय सत्र में काव्य गोष्ठी में आर्या झा ने अपना एक संस्मरण 'लाॅक्ड बैग' प्रस्तुत किया और भावना पुरोहित ने 'प्रकृति का संचालन' पर अपनी कविता प्रस्तुत की। रांची झारखंड से ऐश्वर्यदा मिश्रा ने अपनी व्यंग्य रचना 'रिश्ता' प्रस्तुत करके सबको आनंदित कर दिया। बैंगलोर से अमृता श्रीवास्तव ने अपनी रचना 'इस बार जो आना तुम' पढ़कर श्रोताओं की वाहवाही लूटी तो ज्योति नारायण ने 'प्यार उनका दिल में मेरे यूं रहा पलता हुआ' का सस्वर पाठ किया। सभी सहभागियों ने उनकी रचना की प्रशंसा की। भंवरलाल उपाध्याय ने अपने तेवर के मुक्तक और एक गज़ल का पाठ किया तो गजानन पाण्डेय ने अपनी रचना 'मैं बालक नादान' का पाठ किया। विख्यात नाटककार सुहास भटनागर ने मेरी अदालत, मेरा कटघरा, मैं ही अपना गुनहगार भी' प्रस्तुत करके सभी श्रोताओं की तालियां बटोरी। बबीता अग्रवाल ने समसामयिक विषय पर अपनी एक गज़ल 'आज इंसानियत के नाम पे रोना आया' प्रस्तुत की, सभी ने उसकी प्रशंसा की। सुरेश चौधरी ने 'अगले वर्ष मां दुर्गे आना सजधज' कविता में कोलकाता की दुर्गापूजा से सम्बन्धित तथ्यों को बहुत ही सुन्दर तरीके से समाविष्ट किया। मुख्य अतिथि डॉ. मधु भारद्वाज ने नवरात्रि पर्व पर अपनी रचना 'मां तू तो समस्त ब्रह्माण्ड है' प्रस्तुत की और उन्हें आमंत्रित करने के लिए सूत्रधार संस्था का धन्यवाद ज्ञापित किया। सरिता सुराणा ने 'टूट कर बिखर जाना मेरी नियति नहीं' पढ़ कर सभी को भावविभोर कर दिया। अध्यक्षीय काव्य पाठ करते हुए प्रदीप भट्ट ने 'आजकल कुछ भी सुहाता ही नहीं' गज़ल का वाचन किया। सभी सहभागियों ने सफल काव्य गोष्ठी के आयोजन हेतु आयोजक का आभार व्यक्त किया। ज्योति नारायण के धन्यवाद ज्ञापन के साथ गोष्ठी सम्पन्न हुई।

 


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