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महामारी में छात्र की मनोव्यथा


✍️अक्षय दुबे

वर्तमान समय मे विश्व में व्याप्त महामारी कोविड 19 कोरोना वायरस अपने चरम पर है।विशेषज्ञों का कहना है कि कोविड 19 का अभी और  घातक प्रकोप देखने को मिल सकता है। इस संकट के कारण आने वाले 2 सालों में दुनिया की अर्थव्यवस्था को लगभग 8.5 ट्रिलियन डॉलर  का नुकसान होगा। साथ ही कई और सेक्टर्स में भी काफी नुकसान होगा। सीधे सीधे लगभग 34 मिलियन लोग अत्यंत गरीबी के मुँह में चले जाएंगे। अब उस क्षेत्र को ओर भी रुख कर लिया जाये जिसमें प्रत्येक देश का उज्ववल भविष्य होता है। यहां मैं बात कर रहा हूँ छात्रों की जो इस संकट की घड़ी में अत्यधिक प्रभावित हैं। छात्रों के जीवन व मानसिक स्थिति पर बेहद प्रभाव पड़ रहा है। कोविड19 से विश्व के 1 बिलियन छात्रों पर असर पड़ा है। अगर भारत के परिपेक्ष्य में बात करें तो 32 करोड से भी अधिक छात्रों पर इस महामारी का असर पड़ा है। अब प्रश्न उठता है कि कोरोनाकाल में छात्रों की मनोदशा क्या होगी। छात्रों के सामने भविष्य को लेकर ऐसी विकराल समस्या आ खड़ी हुई है, जो उनके आत्मविश्वास और धैर्य की कठोर परीक्षा ले रही है। हम भारत के ग्रामीण व गरीब तबके के छात्रों की बात करें, तो इस लॉक डाउन में जिनके घर की आमदनी बन्द है, वो छात्र जिनके माता-पिता दिहाड़ी मजदूर, छोटे कामगार, दस्तकार, ग्रामीण परिवेश के छात्र आदि, उनकी जिंदगियां बुरी तरह प्रभावित हैं। जो अभिभावक रोज कमाते-खाते थे, क्या वे छात्र अब विद्यालय वापस आ सकेंगे या रोजी-रोटी  की व्यवस्था में अपने माँ-बाप के साथ जीविकोपार्जन में लग जाएंगे। इसका सीधा सीधा मतलब है कि अशिक्षा व बाल मजदूरी को बढ़ावा मिलेगा। यहां सरकार के सामने यह प्रश्न है कि, क्या सरकार इस चुनौती से निपटने के लिये कोई प्लान है? कई बच्चों का भविष्य दाव पर लगा है, या यूं कहें कि बच्चों के साथ भारत वर्ष का भी भविष्य दाव पर लगा है। इस संकट के समय में ग्रामीण छात्रों के समक्ष कुछ और चुनौतियां भी सामने आई हैं, सीधे तौर पर यहां राज्य सरकार व केंद्र सरकार की विफलता उजागर होती है।

वर्तमान समय में कुछ शैक्षणिक संस्थान ऑनलाइन कक्षाओं  का आयोजन करा रहे हैं। क्या कभी यह सोचा है कि क्या सभी छात्र इस तकनीकी सुविधा का लाभ ले पा रहे होंगे या नही ले पा रहे हैं? मुझे आपको बताते हुए खेद हो रहा हैं कि, एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के सिर्फ 24 फीसदी घरों में ही इंटरनेट की सुविधा है। दिलचस्प तथ्य यह है कि इस मामले में सरकार के पास कोई पुख्ता जानकारी नहीं है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने पहली बार इस बात को जानने की कोशिश की है। एक आकड़े के अनुसार भारत के सिर्फ दो राज्यों के सिर्फ 40 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण परिवारों में इंटरनेट की सुविधा है।  NSS की 2017-18 की एक रिपोर्ट के अनुसार 19 प्रतिशत ग्रामीण छात्र बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। जिसका एक बड़ा कारण आर्थिक समस्या इस रिपोर्ट में दर्शाया गया है। ऐसे में आप उम्मीद कर सकते हैं कि ऑनलाइन कक्षा कहाँ तक सफल हो पायेंगी। और बात करें ऑनलाइन क्लास की तो तो इससे फायदे और नुकसान दोनों हैं। यह सुविधा कम समय के लिये  फायदेमंद है, लेकिन इसके लंबे समय तक उपयोग से छात्रों में चिंता व अवसाद उत्पन्न होता है।इसका उदाहरण वर्तमान में घटने वाली कई घटनाएं हैं, जिसमें से में एक हृदय दहलाने वाली घटना में एक 9वी कक्षा की बच्ची की आत्महत्या करना है। जिसने ऑनलाइन क्लास ना ले पाने की वजह से आत्महत्या का रास्ता चुना। क्या सरकार ऐसी चुनौतियों के लिये तैयार है? सरकार व देश के छात्रों के सामने भविष्य की बहुत चिंताएं हैं। बात अगर समाधान की करें तो इस सत्र को शून्य सत्र घोषित कर दिया जाना चाहिए या फिर एहितयात के साथ पुन: संस्थान खोल दिये जाने चाहिए। हाल ही में डेनमार्क ने शैक्षणिक संस्थानों को पुन:  खोला है। यहां सरकार को चाहिए कि सरकार छात्रों के हित में निर्णय करे। सरकार को छात्र हितों पर भी ध्यान देना ही चाहिए, क्योंकि कई छात्रों का भविष्य सरकार के निर्णय पर निर्भर करता है। मैं उम्मीद करता  हूँ की सरकार छात्रों के हितों में निर्णय लेगी। 

*ग्वालियर म प्र

 


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