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बचे रहेंगे किसान, तभी तो होगा नफा-नुकसान


✍️सुशील कुमार 'नवीन'


पिछले एक पखवाड़े से देशभर में किसान और सरकार आमने-सामने हैं। मामला नये कृषि विधेयकों का है। सरकार और सरकारी तंत्र लगातार इन विधेयकों को किसान हितैषी करार देने में जुटा है वहीं किसान इसे 'अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना ' जैसा बता लगातार मुखर हैं। किसानों पर लाठीचार्ज हो चुका है, राज्यसभा में हंगामा हो चुका है। 8 सांसद निलंबित किये जा चुके हैं। यहां तक विपक्ष दोनों सदनों का बहिष्कार भी कर चुका है। पर सरकार आगे बढ़े कदम किसी भी हालत में पीछे लौटाने को तैयार नहीं दिख रही। कुल मिलाकर स्थिति विकट है। मैं भी इस मामले पर कुछ लिखने की तीन-चार दिन से सोच रहा था, पर लिखूं क्या यही ऊहापोह की स्थिति में था। किसानों के समर्थन पर लिखूं या सरकार के समर्थन पर। समझ मे ही नहीं आ रहा था।


सुबह-सुबह आज घर के आगे कुर्सी डाल चाय की चुस्की ले रहा था। इसी दौरान गांव में नाते में चाचा लगने वाले प्रताप सिंह का आना हो गया। गांव के बड़े सम्मानित व्यक्ति हैं वो। किसान और किसानी पर उनसे कितना ही लम्बा वार्तालाप कर लो। पीछे नहीं हटते। किसान सम्बंधित हर आंदोलन में अग्रणी रहते है। इतनी सुबह गांव से उनका आना मुझे थोड़ा असहज सा लगा।


जलपान के बाद औपचारिकवश मैंने आने का प्रयोजन पूछा तो बोले-सब सरकार की माया है। कहीं धूप-कहीं छाया है। मैंने कहा-चाचा, बड़ी कविताई कर रहे हो। माजरा क्या है? बोले- दो दिन से तेरे भायले(मित्र) के साथ मंडी में बाजरा बेचने आया हुआ हूं। सब फ्री का माल समझते हैं। हमारी तो मेहनत का कोई मोल नहीं। ज्यादा नहीं तो कम से कम सरकारी रेट तो मिल जाए, पर सब के सब मुनाफाखोर लूटन नै लार टपकाई खड़े हैं। उम्मीद थी कि इस बार 3000 रुपये क्विंटल का भाव मिल जाएगा, पर यहां तो आधे ही मुश्किल से मिल रहे हैं।


मैंने कहा- यह तो गलत बात है। आप बेचो ही मत, कम दाम पर। सरकार ने अब तो किसानों के लिए कई बिल पास कर दिए हैं। अगली बार से तो आपको फायदा ही फायदा है। बोले-बेटा, किसानों को कभी फायदा नहीं होना। किसान तो सिर्फ सपने देखने के लिए होते हैं। इस बार बढ़िया दाम मिलेंगे यह सोचकर  छह महीने जी-तोड़ मेहनत करते हैं।और जब फसल निकालकर मंडी की राह पकड़ते हैं उसी समय ये सपने एक-एककर टूटते चले जाते हैं। किसान तो सदा यूं ही मरने हैं।


 मैंने कहा- चाचा, आगे से ऐसा नहीं होगा। सरकार ने किसानों को पूरी आजादी दे दी है। फसल का स्टोर कर समय पर बेहतर दाम ले सकेंगे। बढ़िया दाम मिलते हो तो विदेश में भी फसल बेच सकेंगे।आढ़ती-बिचोलिये सब लाइन पर लगा दिए हैं। मेरी बात सुन चाचा खूब जोर से हंसे और फिर गम्भीर होकर बोले- एक बात बता बेटा! तुम्हारे कितनी जमीन है। मैने कहा-2 एकड़ है। बोले-इस बार इसमें गेहूं बो दे। आगली बार बढ़िया भाव मिलेंगे। मैंने कहा-चाचा, ये किसानी हमारे बस की नहीं है, एक बार की थी। खर्चा हुआ 50 हजार और आमदनी 30 हजार। 20 हजार का सीधा नुकसान। बोले-बस, एक बार में ही हार गया। हमारे साथ तो सदा से ही ऐसा होता आया है। कभी ओले पड़ जाते हैं कभी तूफान आ जाता है। रही सही कसर हर साल फसलों की नई बीमारी पूरी कर देती है। दिखता कुछ और मिलता कुछ है। आगे अच्छा होगा, सोचकर फिर हल उठा लेते हैं।


बोले- रही बात, विदेश में फसल बेचने की। फसल तो तब बिकेगी जब उसे विदेश तक ले जाने की हमारी हिम्मत हो। गाड़ी का भाड़ा तो शहर की मंडी तक लाने का नहीं जाता है। विदेश जाने में तो खुड(खेत) बिक जाएंगे। फसल निकले नहीं, उससे पहले खेत में ही बीज, खाद,राशन का हिसाब करने व्यापारी पहुंच जाते है। आधी से ज्यादा तो वहीं बिन मोल बिक जाती है। शेष आधी लेकर मंडी की राह करते हैं तो कभी नमी, कभी कचरा ज्यादा कहकर उसमें से और काटा मार लिया जाता है। आखिर में जब हिसाब लगाते है तो नफा कम नुकसान ज्यादा दिखता है। अब सुन ले इन बिलों के फायदे की। 


फायदा सदा जमाखोरों को हुआ है और आगे भी होगा। खेती में खर्चे इतने बढ़ लिए कि स्टोर हम कर सकते नहीं। बाहर फसल बेचने की हिम्मत नहीं है। खेती की जमीन सिकुड़ती जा रही है। गांवों में भी कालोनी कटने लगी हैं। किसान और किसानी तो खत्म होने की राह पर है। मान लिया बिल सारे किसानों की भलाई के है। पर किसान बचे रहेंगे तभी तो इनका लाभ मिलेगा। यह कहकर चाचा उठ लिए। बोले-बेटा, ये इंद्रजाल है। इसे समझदार लोग समझ सकते है, हमारे जैसे नहीं। चाचा मुझे भी इस मामले में 'सही कौन' की प्रश्नावस्था में छोड़ 'आच्छया बेटा, राम-राम' कह निकल लिए। 


*हिसार


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