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आजादी की शुभ बेला में




✍️मीरा सिंह 'मीरा'

आजादी की शुभ बेला में
मेरा दिल चाहता है
अनगाए गीतों को गाऊं
वक्त के गर्द में छिपे
अनकही किस्से सुनाऊं
खामोशी की चादर ओढ़
देश पर तन मन वार दिए
अनगिनत दुख दर्द सहे
लब से कभी न उफ किए
हँसकर शूली पर झूल गए
लोग उनका नाम भी भूल गए
जी चाहता है ऐसे गुमनाम  
शहीदों को नमन करूं
अपनी जवानी देकर
अनगिन लोगों ने
प्यारे वतन को सींचा है
उनके दम से गुलजार
भारती का यह बगीचा है
तपती धूप में नंगे बदन
खटते रहते जो अविराम
नींव के उन पत्थरों को
आजादी की शुभ बेला में
मेरा जी चाहता है
उनका अभिनंदन करूं 
शिक्षा व संस्कार से
आने वाले कल को
सिंचित करने वाली
माताओं और बहनों को
विकास के इबारत गढने वाले 

श्रमिक और कृषक जन को
जी चाहता है
आज वंदन करूं
आजादी की शुभ बेला में
मैं बस इतना चाहती हूं
ऐसा कोई नियम बने
अंतिम पंक्ति में खखड़ा
हर व्यक्ति को 
एक जैसी सुविधा मिले
और मिले रोजी-रोटी
सम्मान से जीने का
हक मिले
रोजगार के नए अवसर
सृजित हो
मेरे देश का कोई युवा
अब कुंठित ना हो
सही मायने में तभी हम 
आजादी का जश्न
मनाने के हकदार होंगे।
*डुमरांव, जिला- बक्सर,बिहार 

 

 


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