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विडम्बना नारी जीवन की



✍️शशि पाठक


पुरूष चाहता है शासन
और स्त्री
प्रेम, परवाह और
स्वीकृति अपने वजूद की !
इसीलिए स्वीकार करती है वह
उसका शासन स्वेच्छा से !
किन्तु
जब पूरी नहीं होती उसकी
अपेक्षायें
तो वह सिकुड़ने लगती है
कछुए सरीखी और
मरने लगती है भीतर ही भीतर
और बनजाती है
एक जीती जागती
रोबोट
भावविहीन सी
पुरूष समझता है
इसे अपनी जीत !
यही विडम्बना है
नारी जीवन की !


 


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