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सच को सच कहना जानता हूं



✍️अ कीर्तिवर्द्धन

सच को सच कहना जानता हूं,

परिवार का महत्त्व पहचानता हूं।

 

जो बोया है वहीं तो काटना होगा,

खार बोकर खुद से रार ठानता हूं।

 

शास्त्रों में नहीं बताया अर्थ से मोह,

क्यों अर्थ को सर्वप्रथम मानता हूं?

 

संस्कारों को तज नवीनता की होड़,

भौतिक सुखों में खुशी तलाशता हूं।

 

सीखा ही नहीं सभ्यता का पालन,

अब आयने में बुढ़ापे को निहारता हूं।

*मुजफ्परनगर

 


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